आज का किसान सिर्फ फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि ऐसा काम चाहता है जिसमें बाजार की मांग बनी रहे. 

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बकरी पालन इसी जरूरत को पूरा करता है, जहां कम जगह और कम खर्च में मांस और दूध दोनों से अच्छी कमाई संभव है.

बकरी पालन के लिए बड़े खेत या शेड की जरूरत नहीं होती. थोड़ी सी जगह में भी इसकी शुरुआत की जा सकती है.

बकरियों के चारे, दवा और देखभाल का खर्च गाय-भैंस की तुलना में काफी कम होता है, जिससे मुनाफा ज्यादा बचता है.

अब बकरी पालन सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है. शहरों में भी बकरी के दूध और मांस की खपत तेजी से बढ़ रही है.

कम पूंजी की वजह से सीमांत और छोटे किसान भी 5–10 बकरियों से शुरुआत कर अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं.

इलाके के मौसम और बाजार की जरूरत के हिसाब से नस्ल चुनने पर उत्पादन बेहतर होता है और नुकसान का खतरा कम रहता है.

सिरोही और ओस्मानाबादी नस्लें तेजी से वजन बढ़ाती हैं और गर्म क्षेत्रों में आसानी से ढल जाती हैं.

जमुनापारी और सानन नस्ल दूध उत्पादन में आगे रहती हैं. सही देखभाल में इनसे नियमित आय का मजबूत जरिया बनता है.

कम चारा, कम जगह और दोहरे फायदे (दूध और मांस) की वजह से बरबरी नस्ल नए किसानों के लिए बेहतरीन मानी जाती है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी केवल सामान्य ज्ञान पर आधारित है.

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