अफीम की खेती जितनी रहस्यमयी लगती है, उतनी ही सख्त निगरानी और नियमों में बंधी होती है. 

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इसे “काला सोना” कहा जाता है, क्योंकि सही तरीके से की जाए तो यह किसानों को असाधारण मुनाफा दे सकती है.

अफीम कोई सामान्य फसल नहीं है. इसे उगाने के लिए केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो से विशेष अनुमति लेना अनिवार्य होता है.

सरकार यह तय करती है कि कौन-सा किसान कितनी जमीन पर अफीम की खेती कर सकता है. 

लाइसेंस मिलने के बाद ही नारकोटिक्स विभाग किसानों को बीज उपलब्ध कराता है. खुले बाजार से बीज लेना प्रतिबंधित है.

अफीम की बुवाई अक्टूबर-नवंबर में की जाती है. ठंडा और नमी वाला मौसम पौधों की अच्छी बढ़वार में मदद करता है.

जवाहर अफीम-539, 16 और 540 जैसी किस्में ज्यादा पैदावार के लिए जानी जाती हैं. 

बीज बोने से पहले किसान को नारकोटिक्स विभाग को सूचना देनी होती है. अधिकारी खेत का निरीक्षण कर अनुमति देते हैं.

इस फसल में कीट और बीमारियां जल्दी लगती हैं, इसलिए रोज निगरानी और 8-10 दिन में छिड़काव जरूरी है.

करीब 100 दिन बाद पौधों पर डोडे आते हैं. इनमें चीरा लगाकर निकलने वाला रस ही अफीम होता है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी केवल सामान्य ज्ञान पर आधारित है.

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