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अगर समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह बीमारी मछुआरों की मेहनत और कमाई-दोनों पर भारी पड़ सकती है.
यह एक बेहद सूक्ष्म प्रोटोजोवन परजीवी के कारण होती है, जो पानी के जरिए मछलियों के शरीर में प्रवेश करता है.
संक्रमित मछलियों की त्वचा, पंख और गलफड़ों पर नमक जैसे सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं. यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है.
एक मछली बीमार हुई नहीं कि पूरा तालाब खतरे में आ जाता है, क्योंकि यह रोग पानी के माध्यम से तेजी से फैलता है.
बीमार मछलियां सुस्त हो जाती हैं, खाना छोड़ देती हैं और बार-बार पानी की सतह पर आकर हवा लेने लगती हैं.
संक्रमण होने पर मछलियां तालाब के किनारों, पत्थरों या जाल से अपना शरीर रगड़ती नजर आती हैं.
तालाब में गंदगी, ऑक्सीजन की कमी और जरूरत से ज्यादा मछलियां होने पर यह रोग तेजी से पनपता है.
तालाब में मछली डालने से पहले चूना या पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का उपयोग करना फायदेमंद रहता है.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी केवल सामान्य ज्ञान पर आधारित है.