किसानों को खाद की कमी से बचाने के लिए सरकार का बड़ा दांव, 17 लाख टन यूरिया खरीदेगा भारत
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश माना जाता है. देश में यूरिया उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है, जिसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है. लेकिन ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास बढ़ते तनाव ने गैस सप्लाई को प्रभावित कर दिया है. इसका असर अब उर्वरक उत्पादन पर भी दिखाई देने लगा है.
Urea imports: देश में खरीफ सीजन शुरू होने से पहले केंद्र सरकार ने यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और गैस सप्लाई प्रभावित होने के कारण भारत ने वैश्विक बाजार से 17 लाख टन यूरिया खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. सरकार को आशंका है कि अगर समय रहते पर्याप्त यूरिया का इंतजाम नहीं किया गया तो खरीफ सीजन में किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश माना जाता है. देश में यूरिया उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है, जिसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है. लेकिन ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास बढ़ते तनाव ने गैस सप्लाई को प्रभावित कर दिया है. इसका असर अब उर्वरक उत्पादन पर भी दिखाई देने लगा है.
खरीफ सीजन से पहले सरकार की बड़ी तैयारी
सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने वैश्विक सप्लायर्स से 17 लाख टन यूरिया खरीदने के लिए टेंडर जारी किया है. इसमें करीब 9 लाख टन यूरिया भारत के पश्चिमी तट के लिए खरीदा जाएगा, जबकि बाकी मात्रा पूर्वी तट के लिए मंगाई जाएगी. टेंडर में कहा गया है कि सभी शिपमेंट 20 जुलाई तक रवाना हो जाने चाहिए.
यह टेंडर ऐसे समय पर जारी किया गया है जब अगले महीने से देश में खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने वाली है. धान, मक्का, सोयाबीन और दूसरी प्रमुख फसलों की खेती के लिए इस समय यूरिया की मांग तेजी से बढ़ जाती है.
गैस संकट से प्रभावित हुआ उत्पादन
भारत में यूरिया उत्पादन के लिए अमोनिया का इस्तेमाल होता है और अमोनिया बनाने में प्राकृतिक गैस सबसे अहम कच्चा माल है. लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस की सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक मार्च महीने में दक्षिण एशिया के कुछ उर्वरक संयंत्रों को गैस की कमी के कारण उत्पादन बंद करना पड़ा था. इससे वैश्विक स्तर पर यूरिया सप्लाई प्रभावित हुई और कीमतों में तेजी आ गई.
विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है. वैश्विक यूरिया सप्लाई का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर सीधे खाद बाजार पर पड़ता है.
तेजी से बढ़ी यूरिया की कीमतें
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में भारी उछाल आया है. भारत ने पिछले टेंडर में करीब 25 लाख टन यूरिया खरीदा था, जिसकी कीमतें युद्ध से पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी पहुंच गई थीं.
अब नए टेंडर में भी सरकार को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आने वाले महीनों में उर्वरक कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है.
खरीफ सीजन में कितनी खाद की जरूरत?
उर्वरक मंत्रालय के अनुसार जून से सितंबर के बीच खरीफ सीजन में देश को करीब 3.9 करोड़ टन उर्वरक की जरूरत होती है. फिलहाल देश में लगभग 2 करोड़ टन उर्वरक का स्टॉक मौजूद है. सरकार का कहना है कि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने के लिए लगातार निगरानी रखी जा रही है. साथ ही आयात प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है ताकि किसी तरह की कमी न हो.
किसानों की चिंता बढ़ी
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यूरिया की सप्लाई प्रभावित होती है तो इसका असर सीधे खेती की लागत और उत्पादन पर पड़ सकता है. खरीफ सीजन देश की सबसे बड़ी फसल अवधि मानी जाती है और इसमें धान, मक्का, दालें और तिलहन जैसी प्रमुख फसलें बोई जाती हैं. ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि सरकार समय रहते पर्याप्त खाद उपलब्ध कराएगी ताकि बुवाई के दौरान किसी तरह की दिक्कत न आए.
वैश्विक संकट का असर भारतीय खेती पर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह गया है. खाद, कृषि लागत और फसल उत्पादन पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है.