स्वाद में बासमती से कम नहीं है ये चावल, केवल कश्मीर में होती है खेती.. विदेशों में भी है मांग
कश्मीर की पारंपरिक सुगंधित चावल किस्म मुश्क बुदजी को जीआई टैग मिलने के बाद इसकी मांग और खेती दोनों बढ़ी हैं. कभी राइस ब्लास्ट बीमारी से विलुप्ति के कगार पर पहुंची यह किस्म अब फिर से लोकप्रिय हो रही है. उत्पादन और खेती का रकबा तेजी से बढ़ रहा है. वहीं, मुश्क बुदजी चावल की खेती को फिर से बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने वर्ष 2007 में एक विशेष जागरूकता अभियान शुरू किया.
Paddy Cultivation: जब भी चावल की बात की बात होती है, तो लोगों के जेहन में सबसे पहले बासमती का नाम उभरकर सामने आता है. लोगों को लगता है कि बासमती से ज्यादा स्वादिष्ट दूसरा कोई चावल नहीं है. लेकिन ऐसी बात नहीं है. जम्मू-कश्मीर में उगाए जाने वाले ‘मुश्क बुदजी चावल’ भी किसी मायने में बासमती से कम ही है. इसको अपनी आखियत के चलते जीआई टैग भी मिला हुआ है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘मस्क बुदजी’ की मांग बढ़ गई है. साथ ही किसानों की इनकम में भी इजाफा हुआ है.
मुश्क बुदजी कश्मीर की एक खास और पारंपरिक चावल की किस्म है. यह कश्मीर हिमालय के ऊंचे इलाकों में, समुद्र तल से लगभग 1,600 से 1,800 मीटर की ऊंचाई पर उगाई जाती है. इसके दाने छोटे, मोटे और बेहद खुशबूदार होते हैं, जिसकी वजह से इसकी काफी मांग रहती है. यह चावल कश्मीर की मशहूर पारंपरिक दावत वाजवान में खास तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इसकी अनोखी गुणवत्ता और क्षेत्रीय पहचान को देखते हुए वर्ष 2023 में इसे जीआई टैग भी मिला, जिससे इसकी असली पहचान और विरासत को संरक्षण मिला है.
राइस ब्लास्ट बीमारी से किसानों को नुकसान
मुश्क बुदजी चावल की फसल में राइस ब्लास्ट नाम की बीमारी का असर 1960 के दशक में शुरू हुआ था. इस बीमारी के कारण इसकी खेती धीरे-धीरे घटने लगी और वर्ष 2000 तक इसका उत्पादन बहुत कम हो गया. मोंगाबे-इंडिया को मिले आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में मुश्क बुदजी चावल के बीज उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसकी खेती का क्षेत्र 2022-23 में करीब 250 हेक्टेयर था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1,000 हेक्टेयर होने का अनुमान है. इसी तरह, इस अवधि में चावल का उत्पादन भी करीब 600 टन से बढ़कर 2,500 टन तक पहुंचने की संभावना है. यह बढ़ोतरी इस पारंपरिक किस्म को फिर से लोकप्रिय बनाने और किसानों के बढ़ते रुझान को दर्शाती है.
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किसानों को किया जा रहा जागरूक
वहीं, मुश्क बुदजी चावल की खेती को फिर से बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने वर्ष 2007 में एक विशेष जागरूकता अभियान शुरू किया. इस दौरान विभाग के अधिकारियों ने कई गांवों का दौरा कर यह समझने की कोशिश की कि किसान इस पारंपरिक चावल की खेती से क्यों दूर हो रहे हैं. अभियान के तहत अनंतनाग जिले की कोकरनाग पट्टी के सगम गांव और आसपास के क्षेत्रों को मुश्क बुदजी की खेती के लिए चुना गया. इसके बाद किसानों को इस किस्म की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया और जरूरी सहायता भी दी गई.
अगर खासियत की बात करें तो मुश्क बुदजी कश्मीर घाटी की एक दुर्लभ, पारंपरिक और बेहद खास सुगंधित चावल की किस्म है. इसे इसकी अनोखी खुशबू, हल्के मेवेदार स्वाद और पकने के बाद मुलायम व बिना चिपकने वाली बनावट के लिए जाना जाता है. इसकी विशेष पहचान और गुणवत्ता को देखते हुए इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी दिया गया है. कश्मीर की संस्कृति और खानपान में इस चावल का महत्वपूर्ण स्थान है.
किसान इस तरह करते हैं खेती
मुश्क बुदजी चावल की खेती के लिए अप्रैल और मई महीने में अच्छी तरह तैयार की गई नर्सरी में बीज बोए जाते हैं. रोपाई से पहले खेत की जुताई और पडलिंग (कीचड़युक्त तैयारी) की जाती है तथा प्रति हेक्टेयर लगभग 5,000 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद (एफवाईएम) मिलाई जाती है. जून महीने में करीब 30 दिन पुराने पौधों को नर्सरी से निकालकर मुख्य खेत में रोपा जाता है. आधुनिक खेती पद्धति के अनुसार पौधों के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर (एक फुट) की दूरी रखने की सलाह दी जाती है. इससे सभी पौधों को पर्याप्त धूप मिलती है और बीमारियों का खतरा भी कम होता है.
फसल की बेहतर वृद्धि के लिए यूरिया, डीएपी, एमओपी और जिंक सल्फेट (ZnSO₄) जैसे उर्वरकों का उपयोग किया जाता है. आमतौर पर रोपाई के लगभग 25 दिन बाद यूरिया की अतिरिक्त खुराक (टॉप ड्रेसिंग) भी दी जाती है, जिससे पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है.
खबर से जुड़े आंकड़े
- 2023 में इसे मिला जीआई टैग
- राइस ब्लास्ट से फसल को नुकसान
- 1,000 हेक्टेयर है मुश्क बुदजी का रकबा
- अप्रैल-मई में किसान करते हैं खेती
- किसान जैविक विधि से करते हैं खेती