15 सिंचाई वाली मक्का की खेती कर रहे किसान, बढ़ा भूजल का दोहन.. वैज्ञानिकों की सलाह भी बेअसर
पंजाब के लुधियाना में किसानों का ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती की ओर रुझान बना हुआ है, जबकि कृषि विशेषज्ञ इसे भूजल के लिए नुकसानदायक मान रहे हैं. ग्रीष्मकालीन मक्का को 12-15 सिंचाई की जरूरत पड़ती है, जिससे भूजल पर दबाव बढ़ता है. इसके बावजूद कम अवधि, साइलेज की मांग और बेहतर मुनाफे के कारण किसान इस फसल को प्राथमिकता दे रहे हैं.
Maize Farming: पंजाब के लुधियाना में कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की बार-बार की सलाह के बावजूद किसान पानी की अधिक खपत वाली ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती करने से पीछे नहीं हट रहे हैं. इससे जिले में भूजल स्तर पर दबाव बढ़ने की चिंता फिर से गहरा गई है. जिला कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल ग्रीष्मकालीन और स्प्रिंग मक्का की खेती करीब 15,500 हेक्टेयर क्षेत्र में की गई है. पिछले साल यह रकबा लगभग 16,000 हेक्टेयर था. अधिकारियों का कहना है कि रकबे में आई यह मामूली कमी खेती के रुझान में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देती है.
कृषि विभाग लंबे समय से किसानों को खरीफ मक्का अपनाने के लिए जागरूक कर रहा है, क्योंकि यह धान की तुलना में कम पानी में तैयार होने वाली फसल मानी जाती है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसान अभी भी ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मियों के दौरान ग्रीष्मकालीन मक्का की सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में भूजल का उपयोग होता है, जिससे पहले से गिर रहे भूजल स्तर पर और अधिक दबाव पड़ सकता है. इसलिए किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करने की सलाह दी जा रही है.
ग्रीष्मकालीन मक्का को अधिक सिंचाई की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ मक्का की तुलना में ग्रीष्मकालीन मक्का को अधिक सिंचाई की जरूरत होती है. ऐसे में इसकी खेती राज्य के तेजी से घटते भूजल भंडार पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है. लुधियाना के मुख्य कृषि अधिकारी गुरदीप सिंह ने हिन्दुस्तान टाइम्स को कहा कि कृषि विभाग लगातार किसानों को ग्रीष्मकालीन मक्का की अधिक पानी की जरूरत के बारे में जागरूक कर रहा है और इसकी खेती से बचने की सलाह दे रहा है. उन्होंने कहा कि हालांकि इस फसल की खेती पर कोई प्रतिबंध नहीं है, इसलिए किसानों पर किसी तरह की कार्रवाई या जुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं है.
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कब होती है ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती
वहीं, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की प्रमुख मक्का वैज्ञानिक और मक्का अनुसंधान समूह की प्रमुख सुरिंदर कौर संधू ने कहा कि ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती मई और जून जैसे सबसे गर्म महीनों में की जाती है. इस दौरान पानी की मांग सबसे अधिक होती है, इसलिए इस फसल के लिए बड़े पैमाने पर सिंचाई करनी पड़ती है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान कम पानी वाली फसलों को अपनाएं तो भूजल संरक्षण में मदद मिल सकती है और राज्य के जल संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा.
फसल को 12 से 15 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीष्मकालीन मक्का की फसल को 12 से 15 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है, जबकि खरीफ मक्का में आमतौर पर केवल 2 से 3 बार सिंचाई करनी होती है. ऐसे में ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती भूजल संसाधनों पर काफी अधिक दबाव डालती है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) की मक्का वैज्ञानिक सुरिंदर कौर संधू ने कहा कि पिछले दो-तीन वर्षों में कई किसानों ने गेहूं के बाद ग्रीष्मकालीन मक्का और फिर धान की खेती का तरीका अपनाया है. उन्होंने कहा कि धान की फसल को भी लगभग 150 से 160 सेंटीमीटर पानी की जरूरत होती है. ऐसे में गेहूं-समर मक्का-धान का फसल चक्र राज्य के पहले से घटते भूजल भंडार पर भारी दबाव डाल रहा है.
किसान क्यों कर रहे हैं ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती
उन्होंने कहा कि इसके बावजूद किसान ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती को इसलिए पसंद कर रहे हैं, क्योंकि यह कम समय में तैयार हो जाती है और इससे बनने वाले साइलेज (पशु चारा) की बाजार में अच्छी मांग रहती है. इससे किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी नहीं होती और उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ मिलता है. संधू ने कहा कि किसानों को ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती से हतोत्साहित करने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के विस्तार विभाग की ओर से कई प्रशिक्षण कार्यक्रम और जागरूकता शिविर आयोजित किए गए हैं. हालांकि लगातार जागरूकता अभियानों के बावजूद आर्थिक लाभ को देखते हुए बड़ी संख्या में किसान अभी भी इस फसल की खेती कर रहे हैं.