खरीफ के लिए खाद भरपूर, लेकिन रबी सीजन को लेकर बढ़ी चिंता… राज्यों को केंद्र की चेतावनी
उर्वरक आपूर्ति को लेकर सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण सामने आई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से भारत को मिलने वाली कई महत्वपूर्ण उर्वरक खेप फंस गई हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च से अब तक उर्वरक और उससे जुड़े कच्चे माल से लदे 16 जहाज इस मार्ग में अटके हुए हैं.
India fertilizer supply: देश में खरीफ फसलों की बुवाई का समय नजदीक आ रहा है और इसी बीच उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है. केंद्र सरकार का कहना है कि फिलहाल खरीफ सीजन के दौरान किसानों को खाद की बड़ी कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा, लेकिन रबी सीजन के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है. अंतरराष्ट्रीय हालात, बढ़ती कीमतें और आयात में बाधाओं को देखते हुए सरकार पहले से सतर्क हो गई है.
नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन के दौरान उर्वरक विभाग के सचिव रजत कुमार मिश्रा ने राज्यों को सलाह दी कि वे उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को रोकें और यह सुनिश्चित करें कि खाद का इस्तेमाल केवल कृषि कार्यों में ही हो. उन्होंने कहा कि कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा खाद की खरीद हो रही है, जिससे भविष्य में परेशानी बढ़ सकती है.
वैश्विक संकट का असर भारत पर भी
उर्वरक आपूर्ति को लेकर सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण सामने आई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से भारत को मिलने वाली कई महत्वपूर्ण उर्वरक खेप फंस गई हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च से अब तक उर्वरक और उससे जुड़े कच्चे माल से लदे 16 जहाज इस मार्ग में अटके हुए हैं. इससे यूरिया, डीएपी, अमोनिया और सल्फर जैसे जरूरी उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित हुई है. हालांकि कुछ विशेषज्ञों को उम्मीद है कि चीन द्वारा हाल ही में उर्वरक निर्यात पर लगी रोक हटाने के बाद वैश्विक बाजार में आपूर्ति बेहतर हो सकती है और भारत को भी राहत मिल सकती है.
यूरिया और डीएपी की मांग में तेज बढ़ोतरी
इस साल किसानों द्वारा उर्वरकों की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. 1 मार्च से 25 मई 2026 के बीच देशभर में 50.6 लाख टन यूरिया की बिक्री हुई है. पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 46.01 लाख टन था. यानी इस बार लगभग 10 प्रतिशत अधिक यूरिया की बिक्री हुई है.
महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मांग सबसे ज्यादा बढ़ी है. अकेले महाराष्ट्र में यूरिया की बिक्री पिछले साल की तुलना में 1.4 लाख टन अधिक दर्ज की गई.
इसी तरह डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की बिक्री में भी भारी उछाल देखने को मिला है. इस वर्ष 12.49 लाख टन डीएपी की बिक्री हुई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 8.98 लाख टन था. यानी करीब 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
सल्फर की कमी बनी बड़ी चुनौती
उर्वरक उद्योग इस समय सल्फर की कमी से भी जूझ रहा है. मोरक्को, जिसके पास दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत फॉस्फोरस भंडार हैं, वहां भी पर्याप्त मात्रा में डीएपी और टीएसपी का उत्पादन नहीं हो पा रहा है. इसकी मुख्य वजह सल्फर की उपलब्धता में कमी बताई जा रही है. सल्फर उर्वरक निर्माण का एक महत्वपूर्ण घटक है. इसकी कमी का असर पूरी दुनिया में उर्वरकों की कीमत और उपलब्धता पर पड़ रहा है.
खाद की कीमतों पर भी बढ़ा दबाव
युद्ध और वैश्विक तनाव का असर उर्वरक उत्पादन लागत पर भी दिखाई दे रहा है. उर्वरक कारखानों के लिए खुली निविदा के जरिए खरीदी जाने वाली गैस की कीमत 70 से 80 प्रतिशत तक बढ़ गई है.
भारत ने अब तक लगभग 25 लाख टन यूरिया आयात किया है, जिसकी कीमत युद्ध से पहले की तुलना में 112 प्रतिशत अधिक रही. वहीं 13.5 लाख टन डीएपी का आयात भी लगभग 38 प्रतिशत अधिक कीमत पर करना पड़ा है. इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने के साथ-साथ आपूर्ति बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है.
सरकार के पास फिलहाल पर्याप्त स्टॉक
चुनौतियों के बावजूद सरकार का दावा है कि मौजूदा समय में देश के पास उर्वरकों का मजबूत भंडार मौजूद है. 25 मई तक देश में लगभग 200 लाख टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध था, जबकि पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा 181 लाख टन था.
वर्तमान खरीफ सीजन के दौरान देश को लगभग 390 लाख टन उर्वरकों की आवश्यकता होगी. सरकार का कहना है कि उपलब्ध भंडार और लगातार की जा रही खरीद के कारण खरीफ सीजन में किसानों को बड़ी परेशानी नहीं होगी.
तकनीक के जरिए होगी निगरानी
सरकार अब उर्वरक बिक्री को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में भी काम कर रही है. इसके तहत एग्रीस्टैक डेटा का उपयोग करते हुए किसानों की भूमि और फसल के आधार पर उर्वरक बिक्री को नियंत्रित करने की योजना बनाई जा रही है.
खरीफ सीजन में इच्छुक राज्यों के दो-दो जिलों में इस व्यवस्था का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा. इससे जरूरत से ज्यादा खरीद, कालाबाजारी और गलत उपयोग पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाए और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत रखा जाए, तो देश खरीफ सीजन को आसानी से पार कर सकता है. हालांकि रबी सीजन के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि आने वाले महीनों में यही सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है.