REPORT: बढ़ती गर्मी से फसल, पशुधन और मजदूर सभी प्रभावित, 1 अरब लोगों की रोजी-रोटी खतरे में
गर्मी का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुपालन और मत्स्य पालन भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 25 डिग्री सेल्सियस के ऊपर तापमान पहुंचते ही अधिकतर पशुओं में तनाव शुरू हो जाता है. मुर्गियां और सूअर तो इससे भी कम तापमान पर प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे पसीना नहीं निकाल सकते.
Extreme heat agriculture impact: दुनिया भर में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का बदलाव नहीं रही, बल्कि यह खेती-किसानी और लोगों की रोजी-रोटी के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट ‘एक्सट्रीम हीट एंड एग्रीकल्चर’ ने इस खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 सालों में भीषण गर्मी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं और आने वाले समय में इसका असर और ज्यादा गहरा हो सकता है.
बढ़ती गर्मी का खेती पर सीधा असर
रिपोर्ट बताती है कि अत्यधिक गर्मी का असर इस बात पर निर्भर करता है कि वह कब और कहां पड़ रही है, लेकिन कुल मिलाकर इसका नुकसान लगभग हर जगह देखा जा रहा है. अधिकांश फसलों के लिए 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान पहुंचते ही उत्पादन में गिरावट शुरू हो जाती है. कुछ फसलें जैसे आलू और जौ इससे भी कम तापमान पर प्रभावित होने लगती हैं. इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, वैसे-वैसे खेतों की पैदावार घटेगी, जिससे खाद्य सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा.
पशुधन और मछलियों पर खतरा
गर्मी का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुपालन और मत्स्य पालन भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 25 डिग्री सेल्सियस के ऊपर तापमान पहुंचते ही अधिकतर पशुओं में तनाव शुरू हो जाता है. मुर्गियां और सूअर तो इससे भी कम तापमान पर प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे पसीना नहीं निकाल सकते.
वहीं मछलियों के लिए स्थिति और भी गंभीर है. जब पानी का तापमान बढ़ता है, तो उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मछलियों को सांस लेने में दिक्कत होती है और कई बार उनकी मौत तक हो सकती है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 90 प्रतिशत महासागरों में कम से कम एक बार समुद्री गर्मी की लहर देखी गई थी.
मजदूरों की काम करने की क्षमता पर असर
भीषण गर्मी का असर खेतों में काम करने वाले मजदूरों पर भी पड़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में साल के करीब 250 दिन ऐसे हो सकते हैं, जब इतनी गर्मी होगी कि काम करना मुश्किल हो जाएगा. इसका सीधा असर लोगों की आमदनी पर पड़ेगा, खासकर उन लोगों पर जो रोज कमाते और खाते हैं.
आग, सूखा और बीमारियों का बढ़ता खतरा
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अत्यधिक गर्मी सिर्फ एक समस्या नहीं है, बल्कि यह कई और समस्याओं को जन्म देती है. गर्मी बढ़ने से पानी की कमी, अचानक सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती हैं. इसके अलावा गर्मी की वजह से कीट और बीमारियां भी तेजी से फैलती हैं, जिससे फसलें और ज्यादा प्रभावित होती हैं.
विशेषज्ञों की चेतावनी
सेलेस्टे साउलो ने कहा कि यह केवल एक मौसम संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह कृषि प्रणाली की कमजोरियों को और बढ़ा रही है. उन्होंने जोर देकर कहा कि समय रहते चेतावनी प्रणाली और मौसम से जुड़ी सेवाओं को मजबूत करना बहुत जरूरी है, ताकि इस बदलती स्थिति के अनुसार खुद को ढाला जा सके.
समाधान क्या हो सकते हैं
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि इस समस्या से निपटने के लिए नई तकनीक और बेहतर उपाय अपनाने होंगे. ऐसी फसलें और पशु नस्लें विकसित करनी होंगी जो गर्मी को सहन कर सकें. इसके साथ ही किसानों को आर्थिक सहायता, बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि वे इस तरह के जोखिमों से बच सकें.