महिला समूह ने सब्जियों के बीजों से बनाई इकोफ्रेंडली राखी, 15 दिन में 3 लाख की बिक्री

Eco friendly Vegetable Seeds Rakhi: महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने 15 दिन में 10 हजार से ज्यादा राखियों की बिक्री करके में मोटी रकम हासिल की है. महिलाओं ने कद्दू, लौकी के बीजों से इकोफ्रेंडली राखियां बनाई हैं जिन्हें बाद में गमले में बोकर पौधे बनाया जा सकता है.

नोएडा | Updated On: 28 Aug, 2026 | 04:25 PM

छत्तीसगढ़ की महिलाओं ने भिंडी, लौकी, कद्दू, टमाटर के बीजों से राखियां बनाई हैं. इन राखियों की बाजार में खूब मांग रही है और कमाई भी खूब हुई है. महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने इन राखियों को बनाया है. महिलाओं ने कहा कि 15 दिनों से राखियों की बिक्री जारी है और अभी दो-तीन दिन बिक्री और बनी रहेगी. उन्होंने कहा कि एक राखी 30 रुपये में बिकी है. अब तक कुल 10 हजार राखियों की बिक्री की जा चुकी है. इन राखियों को बाद में गमले, बाड़ी या खेत में लगाया जा सकता है. इससे राखी का इस्तेमाल होने के बाद उसका कचरा नहीं बनेगा, बल्कि वह हरियाली का हिस्सा बन सकेगी.

महिला समूह ने बीजों से बनाई राखियां

छत्तीसगढ़ सरकार महिलाओं को उद्यमिता के जरिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चला रही है. राज्य सरकार उद्यमिता विकास विभाग के अनुसार सक्ती जिले के पलाड़ीकला गांव की महिलाओं को राखी उद्यम की ट्रेनिंग जिला पंचायत स्तर पर दिलाई गई है. इससे महिलाओं को कई तरह के बायोप्रोडक्ट इस्तेमाल करके राखी बना रही हैं. पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अनोखी पहल करते हुए राधा कृष्ण स्वयं सहायता समूह की महिलाएं प्लास्टिक और मोतियों की जगह सब्जियों के बीजों से राखियां तैयार कर रही हैं. खास बात यह है कि रक्षाबंधन के बाद इन राखियों को फेंकने की जरूरत नहीं होगी. इन्हें मिट्टी में बोने पर बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले सकते हैं.

भिंडी, लौकी, कद्दू समेत कई सब्जियों के बीजों का इस्तेमाल

राधा कृष्ण स्वयं सहायता समूह की 10 महिलाएं पिछले करीब 15 दिनों से बीजों से राखियां तैयार करने में जुटी हैं. इन राखियों में भिंडी, लौकी, कद्दू, टमाटर समेत विभिन्न सब्जियों के बीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है. बीजों को वाटर कलर से रंगकर आकर्षक डिजाइन दी जा रही है. प्रत्येक राखी के साथ एक छोटा संदेश भी दिया जा रहा है, जिसमें लिखा है—“इसे मिट्टी में बो दीजिए.” घर बैठे रोजगार के साथ पर्यावरण संरक्षण समूह की महिलाओं का कहना है कि इस पहल से उन्हें दोहरा लाभ मिल रहा है. एक ओर उन्हें घर बैठे रोजगार का अवसर मिला है, वहीं दूसरी ओर लोगों तक पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी पहुंच रहा है.

महिलाएं 15 दिन से राखियां बना रही हैं और बिक्री की जा रही है.

15 दिन में 3 लाख की राखियों की बिक्री

महिलाओं ने मीडिया से कहा कि इन राखियों को बाजार में 20 से 30 रुपये तक की कीमत में बेचा जा रहा है और लोगों से भी अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. 15 दिनों करीब 10 हजार राखियों की बिक्री की जा चुकी है, जिससे करीब 3 लाख रुपये की आमदनी हुई है. अभी दो-तीन दिन और बिक्री की उम्मीद है. महिलाओं के मुताबिक बीज वाली राखियों को रक्षाबंधन के बाद गमले, बाड़ी या खेत में लगाया जा सकता है. इससे राखी का इस्तेमाल होने के बाद उसका कचरा नहीं बनेगा, बल्कि वह हरियाली का हिस्सा बन सकेगी.

जिला प्रशासन कर रहा सहयोग

जिला पंचायत सक्ती के सीईओ वासु जैन ने आधिकारिक बयान में कहा कि इस पहल को आगे बढ़ाने में जिला प्रशासन भी महिलाओं का सहयोग कर रहा है. प्रशासन की ओर से समूह की महिलाओं को बाजार उपलब्ध कराने और उनके उत्पादों को लोगों तक पहुंचाने में मदद की जा रही है, ताकि स्थानीय स्तर पर तैयार हो रही इन पर्यावरण-अनुकूल राखियों को अधिक से अधिक लोग खरीदें. बीजों से तैयार राखी जहां महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह दिखा रही है, वहीं त्योहार के जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रही है.

Published: 28 Aug, 2026 | 04:18 PM

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