भारतीय गेहूं पर बांग्लादेशी झटका! सख्त नियमों से निर्यात का रास्ता हुआ मुश्किल

बांग्लादेश ने 50,000 टन गेहूं आयात के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया है. लेकिन सख्त गुणवत्ता मानदंड के कारण भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धा आसान नहीं दिख रही. कारोबारियों का कहना है कि अतिरिक्त सफाई, अधिक लागत और भुगतान में देरी जैसी वजहें भी भारतीय गेहूं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर बनाती हैं.

नोएडा | Published: 11 Jun, 2026 | 12:07 PM

चीन से चावल या मिर्च, जापान और यहां तक कि नेपाल में आम… और भी तमाम जगह भारतीय खेती से जुड़े उत्पादों के निर्यात को लेकर जिस तरह की खबरें आई हैं, वो चिंताजनक हैं. हालांकि नेपाल में आम को लेकर स्थिति साफ हुई है. भारत ने कहा है कि नेपाल ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध नहीं लगाया है. इस बीच एक खबर बांग्लादेश से है. हमारे पड़ोसी देश ने 50 हजार टन गेहूं खरीदने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किया है. लेकिन जिस तरह के नियम निर्धारित किए गए हैं, उसमें भारतीय निर्यातकों के लिए उभर कर आना और स्पर्धा में शामिल होना बहुत मुश्किल होगा. अब तक यूरोप, ऑस्ट्रेलिया या अमेरिकी देशों के कड़े नियमों के बीच भारत की परेशानी की खबरें आती थीं. लेकिन ऐसा क्या हुआ है कि अचानक नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में भी निर्यात करना मुश्किल दिखाई देने लगा है.

बांग्लादेश के गुणवत्ता मापदंड की वजह से भारतीय निर्यातक मुश्किल में हैं और उन्हें पूरा करने पर भारतीय गेहूं दूसरे देशों के मुकाबले महंगा पड़ेगा, जो बिड जीतने में बाधा खड़ी करेगा. बांग्लादेश के खाद्य महानिदेशालय के विभाग ने मंगलवार को टेंडर जारी किया है. बुधवार से टेंडर खुला है और 24 जून को बंद होगा. खरीदे जाने वाले गेहूं का 60 फीसदी हिस्सा चटगांव बंदरगाह और 40 फीसदी मोंगला बंदरगाह पर पहुंचाया जाएगा.

टेस्ट वेट और डॉकेज के नियमों ने बढ़ाई मुश्किलें

नई दिल्ली के निर्यातक राजेश फराटिया जैन ने अंग्रेजी अखबार बिजनेसलाइन से दिक्कतों के बारे में बात की. उनके मुताबिक टेंडर में गेहूं का न्यूनतम टेस्ट वेट 76 किलोग्राम प्रति हेक्टोलिटर (kg/hl) रखा गया है, जबकि डॉकेज (भूसा, धूल या दूसरी अशुद्धियां) 2 प्रतिशत से कम होना चाहिए. भारत से निर्यात होने वाले ज्यादातर गेहूं का टेस्ट वेट 72-74 kg/hl रहता है और उसमें डॉकेज भी आमतौर पर 2 प्रतिशत से ज्यादा होती है. ऐसे में भारतीय गेहूं को अतिरिक्त सफाई और छंटाई के बाद ही इन शर्तों पर खरा उतारा जा सकता है.

जैन ने बताया कि हाल ही में जॉर्डन के एक टेंडर में 78 kg/hl टेस्ट वेट और 12.4 प्रतिशत प्रोटीन की शर्त रखी गई थी. उस समय केवल मध्य प्रदेश का गेहूं ही इन मानकों को पूरा कर पा रहा था.

कीमत के मोर्चे पर भी भारतीय निर्यातकों के सामने चुनौती है. कारोबारियों के अनुसार भारतीय गेहूं की एफओबी (Free on Board) कीमत करीब 280 डॉलर प्रति टन है. इसमें लगभग 30 डॉलर प्रति टन मालभाड़ा जोड़ने पर कुल लागत 310-315 डॉलर प्रति टन तक पहुंच जाती है.

काला सागर क्षेत्र का गेहूं सस्ते दाम में उपलब्ध

इसके मुकाबले काला सागर क्षेत्र से नया गेहूं 233-238 डॉलर प्रति टन एफओबी पर उपलब्ध है. मालभाड़ा और दूसरे खर्च जोड़ने के बाद भी यह भारतीय गेहूं से सस्ता पड़ता है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय निर्यातकों के लिए मुकाबला कठिन हो जाता है.

जैन के अनुसार भारतीय निर्यातकों को एक और परेशानी का सामना करना पड़ता है. भुगतान का 95 प्रतिशत हिस्सा उन्हें लेटर ऑफ क्रेडिट जारी होने के तीन महीने बाद मिलता है. इससे वित्तीय लागत बढ़ जाती है और मुनाफे का मार्जिन कम हो जाता है. उनका कहना है कि वैश्विक अनाज व्यापार में 25-30 डॉलर प्रति टन का अंतर भी बहुत बड़ा माना जाता है.

भारत में रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन की उम्मीद

इस बीच भारत में गेहूं उत्पादन 2025-26 विपणन वर्ष में रिकॉर्ड 120.65 मिलियन टन रहने का अनुमान है. मौसम को लेकर कुछ चिंताएं जरूर थीं, लेकिन सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 35 मिलियन टन गेहूं की खरीद की है.

रिकॉर्ड उत्पादन के चलते तीन साल के अंतराल के बाद भारत से गेहूं निर्यात फिर शुरू होने की उम्मीद बढ़ी है. कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार 2026-27 में भारत का गेहूं निर्यात 20 लाख टन तक पहुंच सकता है.

दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा जैसे बड़े उत्पादक देशों में उर्वरक की कमी और लंबे समय तक सूखे जैसे हालात ने वैश्विक गेहूं व्यापार को प्रभावित किया है. ऐसे समय में बांग्लादेश का यह टेंडर अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए अहम माना जा रहा है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि भारतीय निर्यातक कड़े गुणवत्ता मानदंडों और कीमत की चुनौती के बीच कितनी हिस्सेदारी हासिल कर पाते हैं.

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