एग्री सेक्टर में ट्रेंड युवाओं की भारी कमी बनी मुसीबत, मॉडर्न खेती में शिफ्टिंग टाइम ज्यादा लग रहा
केंद्रीय कृषि आयुक्त पीके सिंह ने बुधवार को इंडस्ट्री बॉडी BASAI के कार्यक्रम में कहा कि जैविक खेती के इनपुट को बड़े पैमाने पर लाने की योजना को ट्रेंड कर्मचारियों की कमी के कारण झटका लग सकता है. उन्होंने बढ़ते बायो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सहारा देने के लिए तुरंत स्किल डेवलपमेंट के उपाय करने की बात कही है.
देश में कृषि के विकास और इसे मॉडर्न करने के लिए जरूरी वर्कफोर्स की भारी कमी सामने आई है. इसके चलते देश के एग्रीकल्चर सेक्टर को पारंपरिक खेती से मॉडर्न खेती की ओर बढ़ने में उम्मीद से ज्यादा समय लग रहा है. एक्सपर्ट ने कहा है कि टेक्निकल जानकारी की कमी, युवाओं का गांवों से शहरों की ओर पलायन समेत कई बिंदु निकलकर सामने आए हैं जो चिंताजनक हैं. केंद्रीय कृषि आयुक्त पीके सिंह ने चिंता जताते हुए कहा कि कुशल कर्मचारियों की कमी से भारत के बायो एग्रीकल्चर समाधानों को बढ़ावा देने की कोशिश धीमी हो सकती है.
कुशल कर्मचारियों की कमी से कृषि विकास धीमा रहने का खतरा
इंडस्ट्री बॉडी BASAI ने विज्ञप्ति में बताया कि केंद्रीय कृषि आयुक्त पीके सिंह ने बुधवार को कार्यक्रम में कहा कि जैविक खेती के इनपुट जैसे बायो स्टिमुलेंट से लेकर बायो पेस्टिसाइड तक को बड़े पैमाने पर लाने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना को ट्रेंड कर्मचारियों की कमी के कारण झटका लग सकता है. उन्होंने बढ़ते बायो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सहारा देने के लिए तुरंत स्किल डेवलपमेंट के उपाय करने की बात कही है.
स्ट्रक्चरल गैप कम करना जरूरी- केंद्रीय कृषि आयुक्त
इंडस्ट्री बॉडी BASAI के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि आयुक्त ने कहा कि केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड बनाने में अभी लगे कर्मचारियों को सीधे तौर पर जैविक प्लांट में नहीं लगाया जा सकता. उन्होंने कहा कि केमिकल इंजीनियरों के पास जैविक डिस्टिलेशन या फर्मेंटेशन सिस्टम के लिए जरूरी विशेषज्ञता अपने आप नहीं हो सकती. उन्होंने इसे एक स्ट्रक्चरल गैप बताया जिसे भारत के बायो समाधानों से जुड़े बड़े लक्ष्यों को हासिल करने से पहले ठीक करने की जरूरत है.
केमिकल खेती से जैविक खेती की ओर बढ़ने में देरी
पहले भी कुछ रिपोर्ट में यह सामने आ चुका है कि भारत में बायो एग्री समाधानों जैसे बायो पेस्टिसाइड्स, बायो फर्टिलाइजर और प्रिसिजन एग्रीकल्चर (सटीक खेती) को बढ़ावा देने में अभी कुशल युवाओं की कमी एक बड़ी बाधा है. ट्रेंड प्रोफेशनल्स में जैसे एग्रोनॉमिस्ट, बायोटेक्नोलॉजिस्ट और स्किल्ड फील्ड टेक्नीशियन की भारी कमी है. जमीनी स्तर पर पर्याप्त टेक्निकल सपोर्ट और वर्कफोर्स की क्षमता के बिना केमिकल खेती से बायोलॉजिकल खेती की ओर बढ़ने में काफी देरी हो रही है.
कमी की 3 बड़ी वजहें सामने आईं
- टेक्निकल जानकारी की कमी – बायो एग्री समाधानों के लिए सटीक इस्तेमाल, मिट्टी की निगरानी और बायोलॉजिकल इनपुट्स की समझ जरूरी है. गांवों में मौजूद लेबर फोर्स के पास आमतौर पर यह फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं होती है.
- गांवों से शहरों की ओर पलायन- युवा पीढ़ी इंडस्ट्रियल और सर्विस नौकरियों के लिए शहरों की ओर जा रही है, जिससे खेती करने वाली वर्कफोर्स में ज्यादातर बुज़ुर्ग और बिना खास स्किल वाले लोग ही रह गए हैं.
- बदलाव बेहद धीमा- खेत के स्तर पर नए बायोटेक और बायोलॉजिकल तरीकों को मैनेज और लागू न कर पाने के कारण पर्यावरण के अनुकूल खेती को बड़े पैमाने पर अपनाने में रुकावट आती है.