यूरिया आयात पर निर्भरता घटाने की तैयारी, सरकार ने खेती में अमोनिया के इस्तेमाल को दी मंजूरी
Anhydrous Ammonia: केंद्र सरकार ने खेती में 82 फीसदी नाइट्रोजन वाले एनहाइड्रस अमोनिया के उपयोग को तीन साल के लिए मंजूरी दे दी है. अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो भारत सीधे खेती में अमोनिया का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा.
Urea Alternative: देश में यूरिया की बढ़ती मांग और सीमित उपलब्धता के बीच केंद्र सरकार ने खेती के लिए एक बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने पहली बार 82 प्रतिशत नाइट्रोजन (N) वाले एनहाइड्रस अमोनिया (Anhydrous Ammonia) को कृषि उपयोग की अनुमति दे दी है. अब इसे अगले तीन साल तक उर्वरक के रूप में बनाया और इस्तेमाल किया जा सकेगा. माना जा रहा है कि, अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो भारत सीधे खेती में अमोनिया का उपयोग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा. अभी अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में इसका इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी सफलता केवल मंजूरी मिलने पर नहीं, बल्कि खेतों तक इसे सुरक्षित तरीके से पहुंचाने और इस्तेमाल करने की व्यवस्था पर निर्भर करेगी.
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
फिलहाल किसानों के बीच सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक यूरिया है, जिसमें 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है. दूसरी ओर, एनहाइड्रस अमोनिया में 82 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, यानी कम मात्रा में भी पौधों को अधिक नाइट्रोजन मिल सकती है. कृषि मंत्रालय ने 23 जुलाई को जारी अधिसूचना में बताया कि, उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) के तहत अगले तीन सालों के लिए एनहाइड्रस अमोनिया के निर्माण और उपयोग की अनुमति दी गई है.
खेत में कैसे होगा इसका इस्तेमाल?
एनहाइड्रस अमोनिया गैस के रूप में होती है. इसलिए इसे सामान्य यूरिया की तरह खेत में छिड़का नहीं जा सकता. इसे खास मशीनों की मदद से मिट्टी के अंदर इंजेक्ट करना पड़ता है. यही वजह है कि, विशेषज्ञ इसे लागू करने को सबसे बड़ी चुनौती मान रहे हैं. अगर गैस का रिसाव हुआ तो यह किसानों और आसपास के लोगों के लिए खतरा पैदा कर सकती है. इसके लिए सुरक्षित भंडारण, परिवहन और आधुनिक उपकरणों की जरूरत होगी.
आईसीएआर के परीक्षण में क्या मिला?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों में ग्रीन अमोनिया के उपयोग का परीक्षण किया गया. शुरुआती परीक्षणों में कुछ जगहों पर सीधे बोए गए धान (डायरेक्ट सीडेड राइस) में सामान्य यूरिया की तुलना में पौधों की बढ़वार और हरियाली बेहतर देखने को मिली. हालांकि कुछ खेतों में अमोनिया समान रूप से नहीं पहुंच पाने के कारण पौधों की ग्रोथ भी एक जैसी नहीं रही. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले इसकी इंजेक्शन प्रणाली और उपयोग के तरीके को और बेहतर बनाने की जरूरत है.
हरित अमोनिया और ग्रीन यूरिया पर भी जोर
सरकार अब पारंपरिक उर्वरकों के साथ-साथ ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया को भी बढ़ावा दे रही है. आंध्र प्रदेश के पुडीमडका में प्रतिदिन 150 टन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया संयंत्र की पायलट परियोजना विकसित की जा रही है. इस परियोजना में कार्बन कैप्चर तकनीक और पानी से हाइड्रोजन तैयार करने जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होगा. विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े स्तर पर ग्रीन अमोनिया संयंत्र लगाने के लिए लगभग 13 हजार करोड़ से 15 हजार करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी.
यूरिया की मांग लगातार बढ़ रही
खरीफ सीजन में बुवाई तेज होने के साथ यूरिया की मांग भी तेजी से बढ़ी है. जुलाई के पहले पखवाड़े में ही महीने की 60 प्रतिशत से अधिक मांग पूरी हो चुकी थी. भारत हर साल करीब 100 लाख टन यूरिया आयात करता है, जबकि देश में लगभग 300 लाख टन उत्पादन होता है. ऐसे में सरकार ऐसे विकल्पों पर काम कर रही है, जिससे भविष्य में आयात पर निर्भरता कम हो और किसानों को पर्याप्त उर्वरक मिल सके.
अगर एनहाइड्रस अमोनिया का सुरक्षित और सफल उपयोग संभव हो जाता है, तो किसानों को कम मात्रा में अधिक नाइट्रोजन उपलब्ध हो सकेगी. इससे उर्वरक की उपयोग क्षमता बढ़ सकती है और भविष्य में लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है.