अगले 54 साल तक 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी मकर संक्रांति, सूर्य और चंद्रमा की चाल से जुड़ा है रहस्य!

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति 2026 आज यानी 15 जनवरी को मनाई जा रही है, क्योंकि सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश कर चुके हैं. हर साल सूर्य के राशि परिवर्तन में करीब 20 मिनट की देरी होती है, जिससे समय के साथ संक्रांति की तारीख आगे खिसकती जाती है. ज्योतिषियों के अनुसार, इसी कारण आने वाले कई दशकों तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी.

नोएडा | Published: 15 Jan, 2026 | 01:22 PM

Makar Sankranti 2026: आज यानी 15 जनवरी को देशभर में मकर संक्रांति का पावन त्योहार मनाया जा रहा है. यह वो खास दिन है जब सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इस बदलाव के साथ ही पूरे दिन का पुण्यकाल शुरू हो गया है, जो लगभग दोपहर तक रहेगा. यानी आज का दिन पूजा, स्नान, दान और नए काम की शुरुआत के लिए बेहद शुभ माना जाता है.

ज्योतिषियों के अनुसार, आने वाले कई दशकों तक मकर संक्रांति मुख्य रूप से 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी. समय के साथ यह पर्व धीरे-धीरे अगले दिन यानी 16 जनवरी को मनाया जाने लगेगा. यह बदलाव साल दर साल छोटे-छोटे अंतर के कारण होता है, लेकिन इसका महत्व हर साल वैसे ही बना रहता है.

सूर्य का राशि परिवर्तन और समय का बदलाव

ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि सूर्य का हर साल राशि बदलना यानी धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करना हमेशा एक ही समय पर नहीं होता. दरअसल, सूर्य का राशि परिवर्तन हर साल लगभग 20 मिनट देर से होता है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर इस साल सूर्य मकर राशि में 9:39 बजे प्रवेश करता है, तो अगले साल यह लगभग 20 मिनट देर यानी 9:59 बजे होगा. अब अगर हम इस छोटे-छोटे 20 मिनट के अंतर को जोड़ दें, तो तीन साल में कुल मिलाकर लगभग एक घंटे का अंतर बन जाता है. यह बदलाव हर साल थोड़ा-थोड़ा होता है, लेकिन समय के साथ जमा होकर बड़ा अंतर पैदा करता है.

इसके अलावा, ज्योतिष में यह भी माना जाता है कि सूर्य और चंद्रमा जैसे ग्रहों की गति सिधी होती है, यानी ये कभी पीछे की ओर नहीं चलते. यही कारण है कि मकर संक्रांति का समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि मकर संक्रांति का पर्व हमेशा एक ही तारीख और समय पर नहीं होता.

इतिहास में देखें तो 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती थी. उससे पहले 1864 से 1936 तक यह पर्व 13 जनवरी को और 1792 से 1863 तक 12 जनवरी को मनाया गया था. दिलचस्प बात यह है कि साल 1863 में 12 जनवरी को ही स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था और उसी दिन मकर संक्रांति का पावन पर्व भी मनाया गया था.

मकर संक्रांति का महत्व

सनातन धर्म में मकर संक्रांति का दिन बेहद पवित्र और शुभ माना गया है. यह दिन सूर्य देव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है और इसे नई शुरूआत, सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली का दिन माना जाता है. खासतौर पर इस दिन स्नान और दान का विशेष महत्व है.

मान्यता है कि संक्रांति के दिन गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और आत्मा शुद्ध होती है. यह स्नान न केवल शारीरिक रूप से ताजगी देता है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति का भी अनुभव कराता है. लोग इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर नदी में स्नान करते हैं और सूर्य को अर्घ्य देते हैं, ताकि उनके जीवन में उजाला, सुख और समृद्धि बनी रहे.

मकर संक्रांति का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि यह मौसम और प्रकृति के बदलाव का भी संकेत देती है. इस दिन सूर्य की किरणें धीरे-धीरे सर्दियों की ठंड से गर्म मौसम की ओर बदलाव लाती हैं. किसान इस दिन अपने खेतों में नए बीज बोने और फसलों की देखभाल की तैयारी शुरू करते हैं. इसलिए यह पर्व कृषि और प्रकृति से जुड़े लोगों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है.

राशि अनुसार दान की जाने वाली वस्तुएं

इस तरह मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण पर्व है. इस दिन की साधना, स्नान और दान से जीवन में सुख, समृद्धि और शुभ फल प्राप्त होते हैं.

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