Makar Sankranti 2026: जहांगीर से लेकर क्वीन विक्टोरिया तक खिचड़ी की दीवानगी, जानिए दिलचस्प किस्से

धार्मिक परंपराओं में भी खिचड़ी का विशेष स्थान है. बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान खिचड़ी को “खिचुरी” के रूप में प्रसाद दिया जाता है. ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित 56 भोगों में खिचड़ी प्रमुख मानी जाती है. यहां इसे पवित्र भोजन के रूप में देखा जाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 15 Jan, 2026 | 08:13 AM

हिंदू धर्म में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मौसम, सूर्य और जीवनशैली के बदलाव का संकेत मानी जाती है. पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे उत्तरायण, पोंगल, लोहड़ी और कहीं-कहीं खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है. खास तौर पर उत्तर भारत में मकर संक्रांति आते ही खिचड़ी की खुशबू घर-घर फैल जाती है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा शुरू कैसे हुई और यह व्यंजन इतना लोकप्रिय कैसे बन गया?

खिचड़ी: सादा भोजन, गहरा अर्थ

खिचड़ी को अक्सर साधारण भोजन समझ लिया जाता है, लेकिन इसकी सादगी में ही इसका महत्व छिपा है. चावल और दाल से बनने वाली यह डिश न सिर्फ पेट के लिए हल्की होती है, बल्कि शरीर को जरूरी ऊर्जा भी देती है. सर्दियों के मौसम में जब पाचन कमजोर हो जाता है, तब खिचड़ी शरीर को संतुलन में रखने का काम करती है. शायद यही वजह है कि मकर संक्रांति जैसे मौसम परिवर्तन के पर्व पर इसे विशेष रूप से खाया जाता है.

खिचड़ी शब्द की जड़ें और पौराणिक कथा

खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के “खिच्चा” से मानी जाती है, जिसका अर्थ है मिलाकर पकाया गया भोजन. महाभारत काल में भी खिचड़ी का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि वनवास के दौरान द्रौपदी ने पांडवों के लिए खिचड़ी बनाई थी. इसी खिचड़ी के एक दाने से भगवान कृष्ण ने ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों की भूख शांत की थी. इस कथा के बाद खिचड़ी को अन्नपूर्णा और कृपा का प्रतीक माना जाने लगा.

चंद्रगुप्त और चाणक्य की रणनीति में खिचड़ी

इतिहास में खिचड़ी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि सीख भी बनी. मगध साम्राज्य के समय की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य जब युद्ध में असफल होकर लौट रहे थे, तब एक वृद्धा ने उन्हें खिचड़ी खिलाई. गर्म खिचड़ी से उनका हाथ जल गया तो वृद्धा ने समझाया कि पहले किनारे से खाना चाहिए, बीच में हाथ डालने से जलन होगी. इसी बात से चाणक्य को रणनीति की सीख मिली और बाद में इसी सोच से चंद्रगुप्त ने साम्राज्य की नींव रखी.

मुगल काल में खिचड़ी बनी शाही पकवान

समय के साथ खिचड़ी राजमहलों तक पहुंची. मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में इसे शाही दर्जा मिला. जहांगीर को मेवों से सजी खिचड़ी पसंद थी, जबकि औरंगजेब मछली और अंडे वाली खिचड़ी का शौकीन बताया जाता है. मुगल रसोई में खिचड़ी में केसर, जावित्री और सूखे मेवे डाले जाने लगे, जिससे इसका स्वाद और भी निखर गया.

मंदिरों और प्रसाद में खिचड़ी की भूमिका

धार्मिक परंपराओं में भी खिचड़ी का विशेष स्थान है. बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान खिचड़ी को “खिचुरी” के रूप में प्रसाद दिया जाता है. ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित 56 भोगों में खिचड़ी प्रमुख मानी जाती है. यहां इसे पवित्र भोजन के रूप में देखा जाता है.

देश-विदेश तक पहुंची खिचड़ी

खिचड़ी की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही. ब्रिटिश काल में यह व्यंजन इंग्लैंड पहुंचा, जहां इससे प्रेरित होकर “केडगिरी” नाम की डिश बनी. कहा जाता है कि इंग्लैंड की महारानी क्वीन विक्टोरिया को भी खिचड़ी पसंद थी, जिसे उन्होंने अपने भारतीय शिक्षक से जाना.

मकर संक्रांति पर खिचड़ी क्यों खास?

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाना सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक है. नई फसल का अन्न, दाल और घी मिलकर बनी खिचड़ी समृद्धि, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश देती है. शायद इसी वजह से सदियों बाद भी खिचड़ी भारतीय थाली की शान बनी हुई है और मकर संक्रांति इसके बिना अधूरी मानी जाती है.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 15 Jan, 2026 | 08:11 AM

कीवी उत्पादन के मामले में देश का सबसे प्रमुख राज्य कौन सा है