मकर संक्रांति पर क्यों खाई जाती है खिचड़ी? पौराणिक कारण जानकर रह जाएंगे हैरान

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति का पर्व सीधे तौर पर सूर्य देव से जुड़ा हुआ है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है. मान्यता है कि इसके बाद से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जिससे ठंड धीरे-धीरे कम होती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 Jan, 2026 | 08:49 AM

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति भारत के उन पर्वों में से एक है, जो सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि मौसम, प्रकृति और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है. इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है. माना जाता है कि इसी के साथ सर्दियों का प्रकोप धीरे-धीरे कम होने लगता है और दिन बड़े होने लगते हैं. यही वजह है कि मकर संक्रांति को नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा और शुभ समय का प्रतीक माना जाता है.

देश के कई हिस्सों में इस दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा है, जिसके कारण कहीं-कहीं इसे सीधे “खिचड़ी पर्व” भी कहा जाता है. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इस पर्व का खिचड़ी से क्या लेना देना है? अगर नहीं, तो चलिए जानते हैं क्यों मकर संक्रांति पर काई जाती है खिचड़ी.

सूर्य से जुड़ा पर्व और खिचड़ी की परंपरा

मकर संक्रांति का पर्व सीधे तौर पर सूर्य देव से जुड़ा हुआ है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है. मान्यता है कि इसके बाद से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जिससे ठंड धीरे-धीरे कम होती है. यही कारण है कि मकर संक्रांति को शुभ परिवर्तन और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. प्राचीन काल से किसान इस दिन नई फसल का अन्न ग्रहण करते हैं और सूर्य देव को धन्यवाद देते हैं. खिचड़ी इसी नई फसल से बनने वाला सादा और सात्त्विक भोजन है, जिसे इस दिन खाना शुभ माना जाता है.

अलग-अलग राज्यों में अलग नाम, लेकिन भाव एक

भारत की खूबसूरती इसकी विविधता में है और मकर संक्रांति इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है. लोग एक-दूसरे के घर खिचड़ी भेजते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं. तमिलनाडु में यही पर्व पोंगल कहलाता है, जहां नए चावल से मीठा और नमकीन पोंगल बनाया जाता है. पंजाब और हरियाणा में यह लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है, जिसमें आग के चारों ओर गीत-संगीत और उत्सव का माहौल रहता है. केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है, जबकि असम में बिहू के रूप में यह पर्व पूरे जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है.

पौराणिक कथाओं से जुड़ा खिचड़ी का महत्व

भगवान विष्णु से जुड़ी मान्यता
ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों को हराकर देवताओं को विजय दिलाई थी. कहा जाता है कि उन्होंने असुरों के सिरों को मंदराचल पर्वत के नीचे दबा दिया था. इस जीत की खुशी में देवताओं ने भगवान विष्णु को खिचड़ी का भोग लगाया. तभी से माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाना और जरूरतमंदों को दान देना बहुत शुभ होता है और इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं.

बाबा गोरखनाथ और खिचड़ी पर्व की परंपरा
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के इलाकों में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है. लोक मान्यता के अनुसार, बाबा गोरखनाथ ने मकर संक्रांति के दिन गरीबों, साधुओं और जरूरतमंदों को खिचड़ी खिलाई थी. तभी से इस दिन खिचड़ी बनाने और दान करने की परंपरा शुरू हुई. आज भी गोरखनाथ मंदिर में विशाल खिचड़ी मेले और भंडारों का आयोजन होता है, जहां लाखों श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाते और प्रसाद ग्रहण करते हैं. यह परंपरा सेवा, दान और समानता का संदेश देती है.

आयुर्वेद और ज्योतिष में खिचड़ी का महत्व
खिचड़ी को आयुर्वेद में सबसे हल्का, सुपाच्य और औषधीय भोजन माना गया है. सर्दी के मौसम के बाद शरीर कमजोर हो जाता है और पाचन तंत्र भी सुस्त पड़ता है, ऐसे में खिचड़ी शरीर को संतुलन देती है. ज्योतिष के अनुसार खिचड़ी में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का भी खास महत्व है. चावल को चंद्रमा, दाल को शनि, हल्दी को बृहस्पति और नमक को शुक्र से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से ग्रहों का संतुलन बनता है और व्यक्ति पूरे साल स्वस्थ रहता है.

आयुर्वेद में खिचड़ी का स्थान

खिचड़ी को आयुर्वेद में सबसे उत्तम और सुपाच्य भोजन माना गया है. सर्दियों के बाद शरीर कमजोर हो जाता है और पाचन तंत्र भी सुस्त पड़ सकता है. ऐसे में खिचड़ी शरीर को आराम देती है और अंदर से मजबूत बनाती है. आयुर्वेद के अनुसार चावल, दाल, हल्दी और घी का मेल शरीर के लिए औषधि जैसा काम करता है. यही कारण है कि कई आयुर्वेदिक उपचारों के बाद सिर्फ खिचड़ी खाने की सलाह दी जाती है.

परंपरा जो आज भी जीवित है

आज के आधुनिक दौर में भी मकर संक्रांति पर खिचड़ी की परंपरा पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है. यह पर्व हमें सादगी, स्वास्थ्य और आपसी मेल-जोल का संदेश देता है. खिचड़ी सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वह डोर है, जो पीढ़ियों से लोगों को जोड़ती आ रही है. यही वजह है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने का महत्व आज भी उतना ही खास है, जितना सदियों पहले था.

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