E20 पर जारी बहस के बीच E20 से आगे इथेनॉल की तैयारी, AIDA-IIT दिल्ली ने पेश किया रोडमैप

E20 blending को लेकर जारी बहस के बीच AIDA और IIT Delhi ने फ्लेक्स फ्यूस वेहिकल्स और E20 से आगे इथेनॉल ब्लेंडिंग का रोडमैप पेश किया. जानिए श्वेत पत्रों में क्या कहा गया है और AIDA की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है.

नई दिल्ली | Published: 4 Sep, 2026 | 02:28 PM

भारत में पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E20 को लेकर बहस अभी पूरी तरह थमी भी नहीं है और देश में इथेनॉल के इस्तेमाल को E20 से आगे ले जाने की दिशा में चर्चा शुरू हो गई है. इसी क्रम में All India Distillers’ Association यानी AIDA और आईआईटी, दिल्ली ने फ्लेक्स फ्यूल वेहिकल और सस्टेनेबल बायोएनर्जी को लेकर दो श्वेत पत्र जारी किए हैं. इन रिपोर्टों में भारत के लिए E20 से आगे की इथेनॉल इकॉनमी और ज्यादा इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के इस्तेमाल के लिए जरूरी वाहन और नीतिगत ढांचे का रोडमैप सामने रखा गया है.

यह पहल ऐसे समय में हुई है जब E20 ब्लेंडिंग को लेकर वाहन मालिकों, ऑटोमोबाइल उद्योग और दूसरे हितधारकों के बीच लगातार बहस चल रही है. E20 के प्रभाव, पुराने वाहनों की कंपैटेबिलिटी,माइलेज, कीमत और उपभोक्ताओं पर इसके असर को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं. ऐसे माहौल में अब बहस का अगला चरण यह है कि क्या भारत को E20 पर रुकना चाहिए या इथेनॉल ब्लेंडिंग को इससे आगे बढ़ाया जाना चाहिए.

क्या है आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट में

इसी सवाल के बीच आईआईटी दिल्ली की ओर से तैयार श्वेत पत्र जारी किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत इथेनॉल का इस्तेमाल बड़े स्तर पर करना चाहता है तो सिर्फ फ्यूल ब्लेंडिंग बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए ऐसे वाहनों और पूरे इकोसिस्टम की जरूरत होगी जो अलग-अलग इथेनॉल ब्लेंड्स पर प्रभावी तरीके से चल सकें.

रिपोर्ट में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन यानी FFVs को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है. इसमें वाहन तकनीक, ईंधन की कीमत, ढांचा तैयार करने, टिकाऊ कच्चे माल की उपलब्धता, उपभोक्ताओं की स्वीकार्यता, वित्तीय व्यवस्था और बाजार के विकास जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई है.

हालांकि, इस चर्चा में AIDA की भूमिका को भी ध्यान में रखना जरूरी है. AIDA देश के डिस्टिलरी यानी इथेनॉल उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाला उद्योग संगठन है और इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने में उसका सीधा हित जुड़ा हुआ है. ऐसे में उसके मंच से E20 से आगे इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की वकालत को पूरी तरह निष्पक्ष नीति आकलन के तौर पर देखना तस्वीर का केवल एक हिस्सा होगा. आईआईटी दिल्ली का तकनीकी और नीतिगत अध्ययन इस बहस को एक अलग आधार देता है, लेकिन आगे की नीति तय करते समय सरकार को उपभोक्ताओं, वाहन निर्माताओं, किसानों, तेल कंपनियों और इथेनॉल उत्पादकों समेत सभी पक्षों के हितों और चिंताओं को ध्यान में रखना होगा.

दूसरा श्वेत पत्र, जमीन और पानी के संतुलन पर फोकस

इसी कार्यक्रम में CRID India ने “Towards a Sustainable Bioenergy Future for India: Feedstock Security, Land-Water Balance and The Path Beyond E20” नाम से दूसरा श्वेत पत्र जारी किया. इसमें इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के साथ खाद्य सुरक्षा, कृषि की स्थिरता, जमीन के इस्तेमाल और जल संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखने के सवाल पर चर्चा की गई है.

रिपोर्ट में ‘खाद्य बनाम ईंधन’ की बहस को भी आंकड़ों के आधार पर समझने की कोशिश की गई है. इसमें देश में धान, गन्ने और मक्का जैसी फसलों के कुल रकबे और इथेनॉल उत्पादन के लिए वास्तव में इस्तेमाल होने वाली अतिरिक्त कृषि भूमि के बीच अंतर किया गया है.

अध्ययन के मुताबिक, 2023-24 में इथेनॉल उत्पादन से सीधे जुड़ी कृषि भूमि करीब 34.6 लाख हेक्टेयर थी. यह भारत के कुल फसल क्षेत्र का लगभग 1.58 फीसदी है.

यह आंकड़ा इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने को लेकर चल रही उस बहस को नया संदर्भ देता है, जिसमें जमीन और पानी की उपलब्धता के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए जाते हैं. ऐसे में E20 से आगे बढ़ने की किसी भी नीति के सामने सिर्फ इथेनॉल उत्पादन बढ़ाना ही चुनौती नहीं होगी, बल्कि यह भी तय करना होगा कि सीमित जमीन, पानी और कृषि संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए, ताकि ऊर्जा जरूरतों के साथ खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों का संतुलन भी बना रहे.

E20 के बाद क्या होगा बड़ा सवाल

दोनों श्वेत पत्रों को साथ रखकर देखें तो इनका मूल संदेश यह है कि भारत की इथेनॉल पॉलिसी अब केवल ब्लेंडिंग परसेंटेज तक सीमित नहीं रह सकती. अगर E20 से आगे बढ़ना है तो उसके लिए सस्टेनेबल फीडस्टॉक, पानी और जमीन का बेहतर इस्तेमाल, कंज्यूमर इकॉनोमिक्स, वेहिकल टेक्नोलॉजी और फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक साथ काम करना होगा.

लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि जब E20 को लेकर ही देश में उपभोक्ता और industry स्तर पर बहस जारी है, तब E20 से आगे बढ़ने की नीति कितनी जल्दी और किस मॉडल के साथ लागू की जानी चाहिए.

इन श्वेत पत्रों ने इस बहस को एक नया आयाम जरूर दिया है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कितना इथेनॉल बना सकता है, बल्कि यह भी है कि भारत को कितना इथेनॉल इस्तेमाल करना चाहिए, किस कीमत पर करना चाहिए और इसके लिए किस तरह का मोबिलिटी इकोसिस्टम तैयार करना होगा.

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