क्या अब किसानों को मिलेगा बासमती का असली दाम? सरकार बना सकती है अलग बासमती बोर्ड
किसानों को बीज की गुणवत्ता को लेकर भी परेशानी झेलनी पड़ रही है. कई बार निजी और सरकारी सप्लायर्स से मिलने वाले बीजों की गुणवत्ता सही नहीं होती. कुछ मामलों में बीज मिश्रित निकलते हैं, जिससे किसानों की फसल निर्यात मानकों पर खरी नहीं उतरती. ऐसे में किसान अच्छी कीमत की उम्मीद में निवेश तो करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.
Basmati Board India: देश में बासमती चावल किसानों और निर्यातकों की लंबे समय से चली आ रही मांग अब पूरी हो सकती है. केंद्र सरकार के स्तर पर अलग बासमती विकास बोर्ड बनाने की तैयारी शुरू हो गई है. यह बोर्ड अन्य कृषि और निर्यात बोर्डों की तरह काम करेगा और खास तौर पर बासमती चावल से जुड़े किसानों, व्यापारियों और निर्यातकों की समस्याओं पर ध्यान देगा.
बिजनेस लाइन की खबर के मुताबिक यह कदम तब उठाया गया जब दो बड़े राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से अलग वैधानिक बासमती बोर्ड बनाने की मांग की. उनका कहना है कि अभी बासमती का काम एपीडा यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के तहत होता है, लेकिन वहां बासमती को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है.
किसानों तक नहीं पहुंच रहा सही फायदा
पिछले कुछ वर्षों में बासमती चावल की खेती करने वाले किसानों को उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं मिल पाया है. किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उन्हें फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा. बीते सीजन में बासमती धान के दाम 2500 से 3700 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहे, जबकि किसान 4000 रुपये से अधिक कीमत की उम्मीद कर रहे थे.
बढ़ती लागत ने बढ़ाई परेशानी
बासमती किसानों की मुश्किलें केवल कीमत तक सीमित नहीं हैं. पिछले दस साल में खाद की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ चुकी हैं. इसके अलावा मजदूरी, डीजल, कीटनाशक और खेती से जुड़ी दूसरी लागत भी तेजी से बढ़ी है. निर्यात के लिए जरूरी गुणवत्ता मानकों और रसायनों के अवशेष नियमों का पालन करना भी किसानों के लिए महंगा साबित हो रहा है.
बीज की गुणवत्ता पर भी सवाल
किसानों को बीज की गुणवत्ता को लेकर भी परेशानी झेलनी पड़ रही है. कई बार निजी और सरकारी सप्लायर्स से मिलने वाले बीजों की गुणवत्ता सही नहीं होती. कुछ मामलों में बीज मिश्रित निकलते हैं, जिससे किसानों की फसल निर्यात मानकों पर खरी नहीं उतरती. ऐसे में किसान अच्छी कीमत की उम्मीद में निवेश तो करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.
भारतीय किसान संघ ने उठाई आवाज
इस मुद्दे पर पिछले सप्ताह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ यानी बीकेएस की ओर से एक बड़ी बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA), पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PRMEA), किसान प्रतिनिधि और उद्योग विशेषज्ञ शामिल हुए. बैठक में बासमती किसानों की घटती आय और निर्यात से जुड़ी समस्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई.
पीयूष गोयल से की गई मांग
खबर के अनुसार बैठक के बाद भारतीय किसान संघ ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से अलग बासमती विकास बोर्ड बनाने की मांग की है. बताया जा रहा है कि इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय से भी संपर्क किया गया है. हितधारकों का मानना है कि अलग बोर्ड बनने से बासमती क्षेत्र पर ज्यादा फोकस होगा और किसानों को सीधा फायदा मिल सकेगा.
एपीडा की कार्यप्रणाली पर सवाल
फिलहाल बासमती निर्यात की जिम्मेदारी एपीडा के पास है. हालांकि एपीडा के अंतर्गत बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF) भी काम करता है, लेकिन कई संगठनों ने उसके प्रदर्शन पर नाराजगी जताई है. जानकारी के अनुसार एपीडा बासमती निर्यात से जुड़े पंजीकरण और आवंटन प्रमाणपत्र के नाम पर प्रति टन 70 रुपये शुल्क लेता है. इससे हर साल करीब 45 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जुटती है. आरोप है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक खर्च में चला जाता है और किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता.
अलग बोर्ड बनने से क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अलग बासमती बोर्ड बनाया जाता है तो यह संस्था किसानों, निर्यातकों और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय कर सकेगी. इसके जरिए बीज गुणवत्ता, निर्यात प्रचार, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और किसानों को बेहतर दाम दिलाने पर खास ध्यान दिया जा सकेगा. साथ ही बासमती चावल की वैश्विक पहचान को और मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है.
किसानों को अब फैसले का इंतजार
फिलहाल बासमती किसान और निर्यातक सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं. अगर अलग बासमती बोर्ड बनता है तो इससे देश के लाखों किसानों को राहत मिल सकती है और भारत के बासमती निर्यात को भी नई मजबूती मिल सकती है.