आपके पशु की जान ले सकता है दुग्ध ज्वर, ब्याने के तुरंत बाद भूलकर भी न करें ये काम

ब्याने के बाद गाय और भैंस की सही देखभाल न होने पर दुग्ध ज्वर जैसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, कैल्शियम की कमी और तुरंत पूरा दूध निकालना पशुओं के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. समय पर पोषण, खनिज और इलाज मिलने से पशुओं को स्वस्थ रखा जा सकता है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 4 May, 2026 | 10:21 PM

Milk Fever: डेयरी पशुपालन में कई बार छोटी सी लापरवाही भी बड़ा नुकसान कर सकती है. खासतौर पर गाय या भैंस के ब्याने के बाद का समय बेहद संवेदनशील माना जाता है. इस दौरान पशु को सही देखभाल, संतुलित आहार और जरूरी खनिज नहीं मिलते तो वह गंभीर बीमारी की चपेट में आ सकता है. ऐसी ही एक खतरनाक बीमारी है दुग्ध ज्वर या मिल्क फीवर, जो कई बार पशु की जान तक ले सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार, ब्याने के तुरंत बाद पशु के शरीर में कैल्शियम की जरूरत तेजी से बढ़ जाती है. अगर शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाए तो पशु कमजोर पड़ने लगता है. कई पशुपालक ब्याने के तुरंत बाद पूरा दूध निकाल लेते हैं, जिससे कुछ मामलों में बीमारी का खतरा और बढ़ जाता है. यही वजह है कि पशुपालन विशेषज्ञ इस समय विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.

क्या है दुग्ध ज्वर और कैसे पहचानें इसके लक्षण

दुग्ध ज्वर  को अंग्रेजी में मिल्क फीवर कहा जाता है. यह बीमारी आमतौर पर ब्याने के 72 घंटे के अंदर देखने को मिलती है. इसका मुख्य कारण पशु के खून में कैल्शियम की कमी होना है. शुरुआत में पशु बेचैन दिखाई देता है. उसके कान फड़फड़ाने लगते हैं, सिर हिलने लगता है और शरीर में हल्की कंपन दिखाई देती है. धीरे-धीरे पशु को खड़ा होने में परेशानी होने लगती है. कई बार वह गर्दन को एक तरफ मोड़कर बैठ जाता है और फिर उठ नहीं पाता. अगर समय रहते इलाज न मिले तो स्थिति गंभीर हो सकती है. बीमारी बढ़ने पर पशु पूरी तरह लेट जाता है, आंखों की हरकत कम हो जाती है और शरीर का तापमान भी नीचे गिरने लगता है. अंतिम अवस्था में पशु बेहोश हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार इस बीमारी के साफ लक्षण दिखाई नहीं देते, जिससे संक्रमण और दूसरी दिक्कतों का खतरा बढ़ जाता है.

दूध निकालने की जल्दबाजी भी बन सकती है वजह

जानकारों के मुताबिक, कई पशुपालक ब्याने के तुरंत बाद ज्यादा दूध पाने की उम्मीद में पूरा दूध निकाल लेते हैं. लेकिन ऐसा करना कई बार पशु के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि ब्याने के शुरुआती 48 घंटों में पशु के शरीर को दूध बनाने के लिए भारी मात्रा में कैल्शियम की जरूरत होती है. ऐसे में पूरा दूध निकालने  से शरीर में कैल्शियम तेजी से कम हो सकता है और दुग्ध ज्वर का खतरा बढ़ जाता है. इसीलिए पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि ब्याने के बाद पशु को पौष्टिक आहार, हरा चारा और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में दें. गर्भावस्था के दौरान भी पशु की सही देखभाल जरूरी होती है. अगर इस समय पोषण में कमी रह जाए तो बीमारी का खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है.

बचाव और इलाज के लिए समय पर उठाएं सही कदम

विशेषज्ञों का कहना है कि सही देखभाल से इस बीमारी से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है. ब्याने के पहले और बाद में पशु को कैल्शियम की सही मात्रा देना बेहद जरूरी माना जाता है. सलाह दी जाती है कि ब्याने के 12 से 24 घंटे पहले और ब्याने के बाद 48 घंटे तक पशु को कैल्शियम की खुराक दी जाए. इसके अलावा गर्भावस्था के अंतिम दिनों में पशु को संतुलित आहार  और जरूरी खनिज देना भी जरूरी है. कुछ मामलों में पशु चिकित्सक एनायनिक लवण देने की सलाह भी देते हैं, जिससे शरीर में कैल्शियम का संतुलन बना रहता है. अगर पशु में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. समय पर इलाज मिलने पर ज्यादातर पशु जल्दी ठीक हो जाते हैं. लेकिन लापरवाही करने पर दूध उत्पादन में भारी कमी आ सकती है और गंभीर स्थिति में पशु की मौत भी हो सकती है. पशुपालन विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सावधानी और सही जानकारी से किसान अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं और डेयरी व्यवसाय में होने वाले बड़े नुकसान से बच सकते हैं.

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