गन्ने का नाम आते ही तमाम लोग एक चिंता जाहिर करते हैं कि इसमें पानी का बहुत इस्तेमाल होता है. पानी को लेकर पूरी दुनिया में जिस तरह संकट बढ़ता जा रहा है, ऐसे में चिंता होनी भी चाहिए. लेकिन इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि इन चिंताओं के पीछे वाजिब वजह है या महज एक धारणा बना ली गई है. खासतौर पर इस समय, जब तमाम आधुनिक तकनीकों और किस्मों के आने से गन्ना ही नहीं, हर फसल की जो भी कमजोरियां रही हैं, उन पर काबू पाया जा रहा है.
नई-नई किस्मों का आना ऐसी तमाम समस्याओं का हल है, जो गन्ना सहित बहुत सी फसलों के साथ जुड़ी मानी जाती रही है. इसके साथ ही, हमें यह देखना पड़ेगा कि पानी की वजह से किस उत्पाद पर कितना असर है. भारत सरकार की विशेषज्ञ कमेटी अपने अध्ययन में इस बात को मान चुकी है कि गन्ना इथेनॉल उत्पादन के लिए सबसे अधिक वॉटर एफिशिएंट फसलों में से एक है.
इस्मा के महानिदेशक दीपक बल्लानी इस अध्ययन का हवाला देते हुए बताते हैं, ‘इसको ऐसे समझिए, मक्का के लिए 4,760 लीटर और चावल के लिए 10,790 लीटर की तुलना में प्रति लीटर इथेनॉल के लिए लगभग 3,630 लीटर पानी की जरूरत होती है. यह गन्ने को चावल की तुलना में 66 फीसदी कम पानी का उपयोग करने और महत्वपूर्ण जल संसाधनों का संरक्षण करते हुए भारत के इथेनॉल टारगेट में योगदान देने के लिए एक अधिक टिकाऊ विकल्प बनाता है.’
अब जरा नीचे दिए आंकड़ों पर नजर डालिए-
इन आंकड़ों में प्रमुख फसलों के बीच गन्ने की बेहतर जल उत्पादकता पर प्रकाश डाला गया है. इसमें खपत और उत्पादकता के बीच जो आंकड़ा निकलकर आता है, वह बहुत रोचक है. मक्के के 0.79, गेहूं के 1.21 और चावल के 0.81 के मुकाबले गन्ने का आंकड़ा 7.14 है, जो यह बताता है कि पानी की खपत और उत्पादकता में गन्ना कितना इन फसलों से कितना आगे है. गन्ना अन्य मुख्य फसलों की तुलना में पानी की प्रति इकाई 6 से 9 गुना अधिक उपज देता है. इस्मा के महानिदेशक दीपक बल्लानी कहते हैं, ‘जिस तरह दुनिया में क्लाइमेट चेंज और पानी की कमी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहा है, उसमें यह आंकड़ा बेहद अहम है.’ ये सारे आंकड़े बताते हैं कि गन्ने को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां आम लोगों में रही हैं, वो तमाम अध्ययनों या रिसर्च में गलत पाई गई हैं.