Milk Fever : दूध देने वाली गाय या भैंस जब अचानक सुस्त हो जाए, खड़ी न हो पाए और दूध का उत्पादन एकदम गिर जाए, तो इसे आम कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. खासकर ब्याने के आसपास यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. पशुपालकों के बीच इसे आमतौर पर दुग्ध ज्वर कहा जाता है, जबकि असल में यह बुखार नहीं बल्कि शरीर में कैल्शियम की कमी से होने वाली गंभीर बीमारी है. अगर समय रहते इसका इलाज और बचाव न किया जाए, तो पशु और पशुपालक दोनों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है.
हाइपोकैल्शिमिया क्या है और क्यों होता है
बिहार पशुपालन विभाग के अनुसार, हाइपोकैल्शिमिया वह स्थिति है जब पशु के खून में कैल्शियम की मात्रा अचानक बहुत कम हो जाती है. यह बीमारी ज्यादातर दूध देने वाली गाय-भैंस में पाई जाती है, खासकर ब्याने के बाद. दरअसल, ब्याने के तुरंत बाद शरीर को ज्यादा मात्रा में कैल्शियम की जरूरत होती है, क्योंकि दूध बनने में कैल्शियम तेजी से खर्च होता है. जब शरीर इस जरूरत को पूरा नहीं कर पाता, तब यह रोग सामने आता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि इसे दुग्ध ज्वर कहा जाता है, लेकिन इसमें वास्तव में बुखार नहीं होता.
कब और किन पशुओं में ज्यादा खतरा
यह बीमारी आमतौर पर प्रसव के 72 घंटे के अंदर देखने को मिलती है. खासकर ब्याने के बाद पहले 48 घंटों में अगर पूरा दूध निकाल लिया जाए, तो दुग्ध ज्वर का खतरा और बढ़ जाता है. ज्यादा दूध देने वाले पशु, उम्रदराज गाय-भैंस और पहले भी इस बीमारी से ग्रसित पशु ज्यादा जोखिम में रहते हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, गलत खान-पान और खनिज मिश्रण की कमी भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल है.
लक्षण और होने वाला नुकसान
हाइपोकैल्शिमिया के लक्षण धीरे-धीरे या अचानक सामने आ सकते हैं. पशु सुस्त हो जाता है, चलने-फिरने में परेशानी होती है, खड़ा नहीं हो पाता और कई बार गर्दन एक तरफ मुड़ जाती है. भूख कम हो जाती है और दूध का उत्पादन तेजी से गिरता है. इस रोग के कारण कठिन प्रसव, जेर का नहीं गिरना (आरओपी) और गर्भाशय भ्रंश जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं. अगर इलाज में देरी हो जाए, तो पशु की जान तक खतरे में पड़ सकती है.

बिहार सरकार डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग
बचाव और सही देखभाल ही है समाधान
इस बीमारी से बचाव के लिए सबसे जरूरी है संतुलित आहार. गर्भावस्था के आखिरी दिनों में और ब्याने के बाद पशु को कैल्शियम, फास्फोरस और खनिज मिश्रण जरूर देना चाहिए. ब्याने के तुरंत बाद पूरा दूध निकालने से बचें और धीरे-धीरे दुहाई बढ़ाएं. पशु में कमजोरी या असामान्य लक्षण दिखते ही नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें. समय पर इलाज मिलने से पशु जल्दी स्वस्थ हो सकता है और दूध उत्पादन भी सामान्य बना रहता है. अगर पशुपालक थोड़ी सावधानी और सही जानकारी के साथ पशुओं की देखभाल करें, तो दुग्ध ज्वर जैसी बीमारी से आसानी से बचा जा सकता है और डेयरी से होने वाली आमदनी सुरक्षित रखी जा सकती है.