प्याज लागत 1800 रुपये और सरकारी भाव 1580 रुपये, मुनाफा छोड़िये जबरन घाटे में डाले गए किसान
Onion Price: प्याज किसान भयंकर घाटे में डाले जा रहे हैं. लागत से कम मूल्य तय किए जाने पर प्याज उत्पादक संघ ने घोर आपत्ति जताते हुए इसे तंगी से परेशान किसानों के जले पर नमक छिड़कने के समान बताया है. महाराष्ट्र के प्याज बीज उत्पादक आलिम शेख ने किसान इंडिया को बताया कि प्याज उगाने की लागत और मूल्य में भारी अंतर से किसानों में रोष है.
Onion Production Cost and Price: महाराष्ट्र के किसानों ने प्याज खरीद नियमों में सरकार की ओर से ढील देने पर खुश नहीं हैं. प्याज उत्पादक संघ ने कहा कि एक क्विंटल प्याज की लागत किसान को लगभग 1800 रुपये आती है और सरकार ने प्याज खरीद मूल्य 1580 रुपये तय किया है. जब सरकार खुद किसानों को घाटे में डाल रही है तो उन्हें ज्यादा भाव देने की बात किस मुंह से कही जा रही है. संघ के अध्यक्ष भरत दिघोले ने प्याज कीमतों और खरीद मूल्यों आदि पर सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि किसान का मुनाफा छोड़िए सीधे सीधे घाटे और कर्ज के दलदल में डाला जा रहा है.
महाराष्ट्र स्टेट अनियन ग्रोअर्स एसोसिएशन के नासिक डिस्ट्रिक्ट प्रेसिडेंट जयदीप भदाने ने पीटीआई से कहा कि प्याज खरीद नियमों में ढील दी गई है, लेकिन किसानों को अभी भी नुकसान हो रहा है. असली सवाल यह है कि प्याज की कीमतें कब बढ़ेंगी. उन्होंने कहा कि 3000 रुपये प्रति क्विंटल का मिनिमम खरीद प्राइस मांगा है. महाराष्ट्र प्याज उत्पादक संघ ने केंद्र से सपोर्ट प्राइस पर तुरंत फैसला लेने को कहा है, ताकि किसानों को आर्थिक तंगी और बदहाली से बचाय जा सके.
1580 का भाव काफी नहीं, इसे 3000 करे सरकार
उन्होंने दावा किया कि नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NAFED) और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) द्वारा ऑफर किया गया लगभग 1,580 रुपये प्रति क्विंटल का खरीद रेट मौजूदा मार्केट की उम्मीदों से कम है और खेती की लागत को कवर करने के लिए काफी नहीं है. महाराष्ट्र स्टेट अनियन ग्रोअर्स एसोसिएशन ने कहा कि 3,000 रुपये प्रति क्विंटल के मिनिमम सपोर्ट प्राइस किसानों को दिया जाए.
घोषित रेट किसानों के जले पर नमक छिड़कने के समान
एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भरत दिघोले ने मीडिया से कहा कि प्याज प्रोडक्शन की एवरेज लागत लगभग 1,800 रुपये प्रति क्विंटल थी और किसानों को लागत से कम पर बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा था. उन्होंने कहा कि किसान को लागत से 220 रुपये कम भाव दिया जा रहा है. इस घाटे को कैसे पूरा किया जाएगा. दिघोले ने दावा किया कि जब किसानों को प्रोडक्शन कॉस्ट से कम पर प्याज बेचने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वे पैसे की तंगी में फंस जाते हैं. सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसियों द्वारा घोषित रेट किसानों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है.
लागत छोड़िए मंडी तक ले जाने का भाड़ा निकालना भी मुश्किल
महाराष्ट्र में औरंगाबाद के प्याज बीज उत्पादक और सप्लायर आलिम शेख ने किसान इंडिया को बताया कि प्याज उगाने की लागत और तय किए गए मूल्य में भारी अंतर से किसानों में भयंकर रोष है. बुवाई के वक्त प्याज की कीमतों में भी चढ़ाव और कृषि इनपुट की अधिक कीमत ने उत्पादन की लागत को बेतहाशा बढ़ाया है. लेकिन, मंडियों में आवक बढ़ते ही प्याज के दाम लुढ़क गए. विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने सहकारी एजेंसियों से खरीद कराने के लिए जो भाव तय किया है वो लागत से भी कम है. ऐसे में मुनाफा छोड़िये मजदूरी और मंडी तक ले जाने का भाड़ा तक निकालना तक मुश्किल है.
सहकारी एजेंसियां रोजाना खरीद और किसानों की लिस्ट जारी करें
एसोसिएशन ने प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में ज्यादा ट्रांसपेरेंसी की भी मांग की और मांग की कि NAFED और NCCF उन किसानों की रोजाना लिस्ट पब्लिश करें जिनसे प्याज खरीदा गया था. आग्रह किया कि गड़बड़ियों को रोकने और किसानों के लिए कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग सुनिश्चित करने के लिए एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटियों (APMCs) के जरिए प्रोक्योरमेंट किया जाए.
केंद्र ने प्याज खरीद में साइज, रंग-धब्बों समेत कई मानकों में ढील दी
उन्होंने कहा कि केंद्र ने प्याज खरीद मानक में हल्के करके साइज और क्वालिटी स्पेसिफिकेशन में ढील दी है, एक्सेप्टेबल साइज रेंज को 45-65 mm से बढ़ाकर 35-70 mm कर दिया है और दाग-धब्बों, रंग में अंतर, स्किन डिफेक्ट और धूप से होने वाले मामूली नुकसान से जुड़े नियमों में ढील दी है. इस फैसले का स्वागत है, लेकिन किसान नेताओं ने रविवार को कहा कि किसानों के सामने मुख्य मुद्दा खरीद के लिए एलिजिबिलिटी नहीं, बल्कि दी जा रही कम कीमतें हैं.
प्याज खरीद कैपिंग किसानों के लिए बनी रोड़ा
उन्होंने बताया कि पहले के ग्रेडिंग सिस्टम के तहत, जो किसान खरीद के लिए 30 क्विंटल प्याज लाता था, उसे अक्सर सिर्फ 25 क्विंटल ही लिया जाता था, और बाकी उपज कम मार्केट रेट पर बेची जाती थी. उन्होंने कहा कि ढील दिए गए नियमों का फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें जमीन पर कितने असरदार तरीके से लागू किया जाता है.