27 साल में 24591 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने की आत्महत्या, आंकड़े से टेंशन में केरल सरकार

केरल में 1995 से 2022 के बीच 24,591 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की. रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता कर्ज, जलवायु परिवर्तन, खेती की बढ़ती लागत और फसलों की कीमतों में गिरावट इसके प्रमुख कारण हैं. राज्य में खेती योग्य भूमि और धान का रकबा लगातार घट रहा है, जिससे कृषि संकट और गहरा गया है.

नोएडा | Published: 27 Jun, 2026 | 05:49 PM

केरल में कृषि संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1995 से 2022 के बीच 24,591 किसानों और खेतिहरमजदूरों ने आत्महत्या की. यानी औसतन हर साल करीब 1,069 किसानों और खेतिहर श्रमिकों की जान गई. ये आंकड़े राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र में बढ़ती परेशानियों की ओर इशारा करते हैं. बड़ी बात यह है कि अधिकांश किसानों ने कर्ज से परेशान होकर खुदकुशी की है.

खास बात यह है कि किसानों और खेतिहर श्रमिकों की आत्मत्या के यह आंकड़े महाराजा कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और रूरल एकेडमी फॉर मैनेजमेंट स्टडीज के पूर्व प्राचार्य डॉ. मार्टिन पैट्रिक द्वारा दिए गए हैं. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये आंकड़े ‘कर्षिका केरलम पिन्निट्टा अरुपथु पथिट्टांडुकल’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किए गए हैं, जिसे सेक्रेड हार्ट कॉलेज, थेवरा और ऑर्गेनिक केरल चैरिटेबल ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है.

आत्महत्याओं में केरल की हिस्सेदारी 4.25 प्रतिशत रही

डॉ. मार्टिन पैट्रिक के अनुसार, वर्ष 1995 से 2022 के बीच देश में हुई कुल किसान आत्महत्याओं  में केरल की हिस्सेदारी 4.25 प्रतिशत रही. आत्महत्या करने वाले किसानों और कृषि मजदूरों में 92 प्रतिशत पुरुष थे, जो राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत से काफी अधिक है.  रिपोर्ट बताती है कि यह संकट अब भी जारी है. वर्ष 2014 से 2022 के बीच केरल में 2,233 किसानों ने आत्महत्या की. इनमें सबसे अधिक 453 मामले इडुक्की जिले में दर्ज किए गए. इसके बाद पलक्कड़ में 404 और तिरुवनंतपुरम में 337 किसान आत्महत्याएं दर्ज हुईं.

एक ग्रामीण परिवार की औसत मासिक आय 16,788 रुपये

डॉ. पैट्रिक का कहना है कि किसानों पर बढ़ता कर्ज इस समस्या की सबसे बड़ी वजह है. उनके अनुसार, कर्ज किसानों के जीवन का सबसे बड़ा संकट बन चुका है और यही लगातार हो रही आत्महत्याओं का प्रमुख कारण है. आधिकारिक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए डॉ. मार्टिन पैट्रिक ने कहा कि केरल की लगभग एक-तिहाई आबादी कर्ज के बोझ तले दबी हुई है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है. नाबार्ड के 2021 सर्वे के अनुसार, केरल के एक ग्रामीण परिवार की औसत मासिक आय 16,788 रुपये थी, जबकि उसका मासिक खर्च  14,778 रुपये रहा. यानी परिवार के पास हर महीने केवल 2,010 रुपये की बचत बचती थी. यह 2016-17 में दर्ज 3,975 रुपये की बचत की तुलना में करीब 48 प्रतिशत कम है.

देश का सबसे अधिक औसत घरेलू कर्ज 1.99 लाख रुपये

रिपोर्ट के अनुसार, केरल में देश का सबसे अधिक औसत घरेलू कर्ज 1.99 लाख रुपये है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के करीब 70 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबे हुए हैं और उन पर औसतन 2.2 लाख रुपये का बकाया है. वहीं, केरल इंडिपेंडेंट फार्मर्स एसोसिएशन के एक अध्ययन में किसानों पर औसत कर्ज 5.46 लाख रुपये बताया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता कर्ज और घटती बचत किसानों की आर्थिक परेशानियों को और गहरा कर रहे हैं. अध्ययन में कहा गया है कि किसानों की परेशानियों की वजह सिर्फ कर्ज नहीं है. जलवायु परिवर्तन, जंगली जानवरों के हमले, खेती की बढ़ती लागत, फसलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कुछ नीतिगत फैसले भी कृषि संकट को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं.

केरल में संकट किसी एक फसल तक सीमित नहीं है

रिपोर्ट के अनुसार, देश के अन्य राज्यों की तरह केरल में संकट किसी एक फसल तक सीमित नहीं है. यहां कॉफी, रबर, मसाले, नारियल और अन्य कई फसलों की खेती करने वाले किसान समान रूप से आर्थिक दबाव और अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं. इससे राज्य के कृषि क्षेत्र में संकट और अधिक व्यापक रूप ले चुका है. रिपोर्ट के अनुसार, केरल में अलग-अलग फसलों की खेती करने वाले किसान अलग-अलग समस्याओं से जूझ रहे हैं. इडुक्की और वायनाड के काली मिर्च किसानों को आयात बढ़ने के कारण कीमतों में गिरावट का सामना करना पड़ा. वहीं, इलायची, केला, अदरक और जायफल उत्पादकों को जलवायु परिवर्तन और मौसम की मार से नुकसान हुआ.

खेती योग्य भूमि घटकर 19.67 लाख हेक्टेयर रह गई

रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में खेती योग्य भूमि घटकर 19.67 लाख हेक्टेयर रह गई है. धान की खेती का क्षेत्र भी 1970-71 के 8.8 लाख हेक्टेयर से घटकर 2024-25 में सिर्फ 1.76 लाख हेक्टेयर रह गया है. इसके चलते केरल अपनी बुनियादी सब्जियों की जरूरतों के लिए भी दूसरे राज्यों पर काफी हद तक निर्भर हो गया है. अध्ययन में यह भी कहा गया है कि 2014 से 2022 के बीच किसान आत्महत्याओं की औसत संख्या में कुछ कमी दिखना इस बात का संकेत हो सकता है कि अब पहले की तुलना में कम लोग खेती से जुड़े हुए हैं, क्योंकि राज्य में खेती योग्य भूमि लगातार घट रही है.

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