ठहराव की ओर जलवायु परिवर्तन, इस साल भी सताएगी गर्मी.. खेती पर बुरे असर की चिंताओं में विशेषज्ञ

Cimate Change Impact on Agriculture: विशेषज्ञों को चिंता है कि धरती के वे हिस्से जो हवा से कार्बन सोखने का काम करते हैं, जिन्हें प्राकृतिक कार्बन सिंक कहा जाता है, वे भी भविष्य में ठीक से काम नहीं कर सकेंगे. सरकारों से लेकर वैज्ञानिक और विशेषज्ञों तक, हर किसी को इस समस्या के पीछे ला नीना और अल नीनो जैसी प्राकृतिक गतिविधियों को ढाल बनाकर विकास के नाम पर हो रहे विनाश पर रोक लगानी चाहिए.

निर्मल यादव
नोएडा | Published: 25 Jan, 2026 | 04:18 PM
मौसम विज्ञान का इतिहास बताता है कि हर सदी के पहले क्वार्टर में मौसम की विसंगतियां देखने को मिलती हैं. मौसम के मिजाज में आने वाले मामूली बदलावों का यह दौर लगभग 15 साल तक अपना असर दिखाता है. इस अवधि में मौसम संबंधी चरम स्थितियों यानी एक्सट्रीम वेदर कंडीशन की आवृत्ति बढ़ने के कारण ही जलवायु में बदलाव महसूस होने लगता है. अग्रिम पंक्ति के योद्धा के रूप में किसान ही कुदरत की इस चुनौती का सबसे ज्यादा सामना करते हैं. किसान ही वैश्विक खाद्य श्रृंखला को सुचारू बनाए रखने का दायित्व निभाते हैं, इसलिए जलवायु परिवर्तन के खेती पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव के बारे में नीति निर्माताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, हर किसी को चिंता है.

मौसम संबंधी विसंगतियों से जूझ रही दुनिया

चिंता इस बात की है कि बीती हर सदी की तरह 21वीं सदी भी मौसम संबंधी विसंगतियों का सामना कर रही है. मौसम के मिजाज में बदलाव को महसूस करने की इस स्थिति के लिए मौजूदा दौर के मौसम वैज्ञानिकों ने एक उपयुक्त शब्द गढ़ा है, जिसे ’जलवायु परिवर्तन’ कहा गया है. पिछली सदियों के अतीत को सही साबित करते हुए 21वीं सदी में भी साल 2015 से जलवायु परिवर्तन को महसूस किया जाने लगा था. बीते एक दशक के दौरान मौसम की चरम स्थितियों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है.
इसके परिणाम स्वरूप साल 2024 में धरती ने पिछली एक सदी में सबसे ज्यादा ताप महसूस किया. इसी प्रकार पिछले 2-3 साल से बारिश के असमान वितरण को  भी शिद्दत से महसूस किया जा रहा है. इसके तहत अरब देशों से लेकर राजस्थान तक, कम या न्यूनतम बारिश वाले इलाकों में उम्मीद से ज्यादा बारिश हो रही है. वहीं चेरापूंजी जैसे साल भर बारिश से घिरे रहने वाले इलाकों में सूखे के हालात देखने को मिल रहे हैं. इसका सीधा असर फसल चक्र पर पड़ रहा है. कहीं बारिश का दौर अधिक समय तक चलने के कारण धान सहित अन्य खरीफ फसलें देर से पक रही हैं, तो कहीं देर से ठंड पड़ने के कारण गेहूं की फसल देर से बोने के लिए किसान मजबूर हैं.

मौसम के उतार चढ़ाव में ठहराव आने की शुरुआत 2026 से

मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक केजे रमेश ने 2020 में ही मौसम की उथल पुथल से जुडे इन हालात का जिक्र करते हुए ’चरमपंथी’ हो रहे मौसम के प्रति आगाह कर दिया था. हालांकि उन्होंने मौसम विभाग के पिछले सौ साल के मौसम संबंधी आंकड़ों की बुनियाद पर निकाले गए निष्कर्षों के हवाले से यह भी कहा था कि जलवायु परिवर्तन की उथल पुथल को शांत और स्थिर होने में डेढ़ दशक तक का समय लग सकता है. इसके मद्देनजर किसानों को यह भरोसा दिलाया गया कि मौसम की विसंगतियों को स्थैतिक होने में 2033 तक इंतजार करना पडेगा. इस लिहाज से यह माना जा रहा है कि मौसम के उतार चढ़ाव में ठहराव आने की शुरुआत 2026 से होने लगेगी. इसके फलस्वरूप मौसम की चरम स्थितियों पर भी अंकुश लगने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.
विश्व मौसम संगठन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस साल धरती का तापमान पहले की तुलना में 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ सकता है. इसकी वजह बताई जा रही है कि जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन की गति बरकरार है, इससे मौसम की चरम घटनाएं थम नहीं रही हैं. ब्रिटिश मौसम विभाग ने भी इस दलील का समर्थन करते हुए कहा है कि सदी के सबसे गर्म साल के रूप में चिन्हित किए गए साल 2024 की तुलना में साल 2026 मामूली रूप से ठंडा रहेगा. हालांकि 1850 के बाद, साल 2026, अब तक के सबसे गर्म साबित हुए 4 सालों में शुमार रहेगा. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1850 से 1900 के  दौरान 50 सालों के तापमान की तुलना में साल 2026 में औसत तापमान 1.34 से 1.58 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने का अनुमान है.

2026 में लगातार चौथे साल तापमान में बढ़ोतरी की आशंका

दुनिया के नामचीन मौसम वैज्ञानिक एडम स्केफ का दावा है कि साल 2022 से 2025 के दौरान 3 सालों में वैश्विक तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने के मद्देनजर अब आशंका है कि 2026 में भी लगातार चौथे साल, तापमान में इतनी ही बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है. इससे पहले पूरी सदी के दौरान वैश्विक तापमान कभी भी 1.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं रहा. हालांकि पेरिस उद्घोषणा में वैश्विक नेताओं ने 21वीं सदी के अंत तक धरती की ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया था. इसके बरक्स प्रदूषण जनित कारणों से हो रही ताप वृद्धि के बीच मौसम विज्ञानी कुछ अन्य दलील दे रहे हैं.
उनका मानना है कि अल नीनो जैसी प्राकृतिक स्थितियों ने 2023 और 2024 में धरती का तापमान बढ़ाने में अहम भूमिका निभााई. जबकि 2025 में ला नीना के कमजोर रहने के कारण ताप वृद्धि में थोड़ी कमी रही. इसका एक अन्य वैज्ञानिक पहलू है जिसमें कहा गया है कि बिजलीघर, वाहन और बायलरों से निकलने वाली गैस धरती को गर्म कर रही है और जंगल, नदी एवं पहाड़ नष्ट होने के कारण हवा से कार्बन सोखने की कुदरत की क्षमता भी कम हो रही है. यूएन की रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया है कि 2025 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर अब तक सबसे ज्यादा रहा.
जानकारों को चिंता इस बात की भी है कि धरती के वे हिस्से जो हवा से कार्बन सोखने का काम करते हैं, जिन्हें प्राकृतिक कार्बन सिंक कहा जाता है, वे भी भविष्य में ठीक से काम नहीं कर सकेंगे. समस्या के इस पहलू से स्पष्ट है कि विकास की पुरजोर वकालत करने वाली सरकारों से लेकर वैज्ञानिक और विशेषज्ञों तक, हर किसी को इस समस्या के पीछे ला नीना और अल नीनो जैसी प्राकृतिक गतिविधियों को ढाल बनाकर विकास के नाम पर हो रहे विनाश पर रोक लगानी चाहिए.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

सर्दियों में गुड़ का सेवन क्यों अधिक किया जाता है?