तोते ने उजाड़ दी किसान की फसल, 10 साल की लड़ाई के बाद आया कोर्ट का आदेश, जानें पूरा मामला

Parrots damages anar Crops in maharashtra: महाराष्ट्र में फसल बर्बाद होने के अनोखे मामले में किसान की 10 साल लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार हाई कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. किसान के विरोध में खड़ी महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को कोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया और किसान के पक्ष में फैसला सुनाया है.

नोएडा | Updated On: 27 Apr, 2026 | 02:09 PM

नीलगाय, छुट्टा पशुओं और कीटों से फसल नुकसान होने के बारे में आपने अकसर सुना होगा. लेकिन क्या आपने यह सुना है कि तोते भी फसल को उजाड़ सकते हैं. यह सही घटना है, महाराष्ट्र के वर्धा जिले में सैकड़ों तोते एक साथ अनार के बाग में फलों पर टूट पड़े और सुबह-शाम की धमाचौकड़ी करते हुए अनार के फलों को नुकसान पहुंचाया. इससे किसान की फसल उजड़ गई और फल खराब हो गए हैं. किसान को मुआवजा देने का मामला बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंच गया. 10 साल से चल रहे केस में अब कोर्ट ने किसान के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को तोतों द्वारा खराब किए गए अनार के पेड़ों के लिए किसान को मुआवजा देने का आदेश दिया है. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत ये पक्षी “जंगली जानवर” हैं और राज्य सरकार को अपनी संपत्ति (वन्यजीवों) के कारण नागरिकों को हुए नुकसान की भरपाई करनी चाहिए. जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और निवेदिता मेहता की नागपुर बेंच ने कहा कि अगर किसानों को संरक्षित प्रजातियों के कारण हुए नुकसान का मुआवजा नहीं दिया जाता है, तो वे ऐसे कदम उठा सकते हैं जिनसे वन्यजीवों को नुकसान पहुंचे. ऐसा होने पर अधिनियम का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा, जबकि इस अधिनियम में तोतों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है.

2016 में जंगली तोतों ने अनार के बाग को नुकसान पहुंचाया

कोर्ट ने वर्धा जिले के हिंगी गांव के एक किसान महादेव डेकाते (70) की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश दिया. 24 अप्रैल को पारित आदेश की एक प्रति रविवार को उपलब्ध कराई गई. किसान महादेव डेकाते ने याचिका में दावा किया था कि मई 2016 में पास के वन्यजीव अभयारण्य से आए जंगली तोतों ने उनके अनार के पेड़ों को नुकसान पहुंचाया था और उन्होंने इसके लिए मुआवजे की मांग की थी. राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि अतीत में जारी सरकारी प्रस्तावों (resolutions) में कहा गया था कि मुआवजा केवल तभी दिया जा सकता है जब जंगली हाथी और बाइसन (जंगली भैंसे) फलदार पेड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं. कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क को मानने से इनकार कर दिया.

कोर्ट ने सरकारी दलील को मानने से इनकार किया

कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रस्ताव जारी करने का उद्देश्य प्रभावित किसानों को उनके द्वारा सहे गए नुकसान के लिए मुआवजा देना था. कोर्ट ने कहा कि जब ऐसा उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताया गया है, तो मुआवजे के भुगतान के लिए केवल कुछ ही प्रजातियों के जंगली जानवरों द्वारा किए गए नुकसान पर विचार करना और अन्य प्रजातियों के जंगली जानवरों द्वारा किए गए नुकसान को नजरअंदाज करना कोई समझदारी की बात नहीं है. कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वैधानिक प्रावधानों के तहत मुआवजे का हकदार कोई भी व्यक्ति, केवल इसलिए मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ प्रजातियां सरकारी प्रस्तावों में शामिल नहीं हैं.

कोर्ट ने 200 पेड़ों के नुकसान के लिए मुआवजा राशि तय की

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को 200 पेड़ों को हुए नुकसान के लिए प्रति पेड़ 200 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने आदेश में कहा कि यह कहना कि केवल कुछ ही प्रजातियों द्वारा किए गए नुकसान के लिए किसानों को मुआवजा मिलेगा, इसमें कोई तर्क नहीं है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा करना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन माना जाएगा. कोर्ट ने कहा कि वन्यजीव अधिनियम एक विधायी कानून होने के नाते, किसी भी सरकारी प्रस्ताव पर भारी पड़ेगा (यानी उसे प्राथमिकता दी जाएगी). इसमें आगे कहा गया कि 1972 के एक्ट के प्रावधानों के तहत, जंगली जानवरों को राज्य की संपत्ति घोषित किया गया है, और इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि तोते भी उन्हीं में से एक हैं.

इसलिए कानून हर नागरिक से यह उम्मीद करता है कि वह जंगली जानवरों का रक्षक बने, और इसलिए, यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उन्हें जंगली जानवरों की वजह से होने वाले नुकसान को खुद उठाना पड़े. नहीं तो, जंगली जानवरों की रक्षा का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा और प्रभावित लोग अपनी फसलों और फलदार पेड़ों को बचाने के लिए अपने खुद के बचाव के तरीके अपना सकते हैं, जिससे जंगली जानवरों को नुकसान पहुंच सकता है.

कृषि अधिकारियों ने सर्वे में बताया 50 फीसदी फल नष्ट हुए

याचिका के अनुसार किसान महादेव डेकाटे ने वन और स्थानीय कृषि विभागों के अधिकारियों से शिकायतें दर्ज कराईं, जिन्होंने उनके बाग का दौरा किया और पाया कि लगभग 50 फीसदी फल पक्षियों द्वारा खराब कर दिए गए थे. हालांकि, अधिकारियों ने मुआवज़ा देने में अपनी असमर्थता जताई, क्योंकि सरकारी प्रस्तावों में तोतों जैसे पक्षियों द्वारा किए गए नुकसान के लिए मुआवज़े का कोई प्रावधान नहीं था. सरकार ने डेकाटे की याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि तोतों जैसे पक्षियों को जंगली जानवरों की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है.

किसान ने कहा – 20 लाख रुपये का नुकसान हुआ

याचिकाकर्ता ने वन्यजीव (संरक्षण) एक्ट के प्रावधानों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि जंगली जानवर का मतलब कोई भी ऐसा जानवर है जो प्रकृति में जंगली रूप में पाया जाता है, और एक्ट में सूचीबद्ध जानवरों की सूची में अलेक्जेंड्राइन पैराकीट और तोतों की अन्य प्रजातियां भी शामिल हैं. किसान डेकाटे ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें लगभग 20 लाख रुपये का नुकसान हुआ है. हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार कर लिया, और यह पाया कि एक्ट के तहत बनी अनुसूची (जो प्रकृति में जंगली माने जाने वाले जानवरों/पक्षियों की सूची देती है) में तोते भी शामिल हैं.

Published: 27 Apr, 2026 | 02:05 PM

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