5000 रुपये एकड़ बढ़ गया खेती का खर्च, टेंशन में धान किसान.. कम हो जाएगा मुनाफा !
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने खरीफ सीजन से पहले किसानों की चिंता बढ़ा दी है. जुताई, सिंचाई, कटाई और मशीनों का खर्च तेजी से बढ़ रहा है. किसानों का कहना है कि खेती की लागत प्रति एकड़ हजारों रुपये बढ़ गई है, जबकि MSP में मामूली बढ़ोतरी हुई है. इससे मुनाफा घटने और कर्ज बढ़ने का खतरा बढ़ा है.
पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का असर अब किसानों पर भी पड़ने लगा है. ऐसे में खरीफ सीजन शुरू होने से पहले ही बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश के किसानों की चिंता बढ़ गई है. किसानों का कहना है कि डीजल महंगा होने से खेती करना महंगा हो गया है. इससे अन्नदाताओं के ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. किसानों के मुताबिक, पहले एक बार जुताई का खर्च करीब 800 रुपये प्रति एकड़ पड़ता था, लेकिन डीजल महंगा होने के बाद यह बढ़कर लगभग 1,000 रुपये प्रति एकड़ हो गया है. इससे खेती की लागत प्रति एकड़ 5000 रुपये तक बढ़ गई है. लेकिन लागत के मुकाबले धान के एमएसपी में बढ़ोतरी नहीं हुई है. ऐसे में धान किसानों को इस बार नुकसान उठाना पड़ सकता है.
खास बात यह है कि आंध्र प्रदेश के किसान डीजल महंगा होने से कुछ ज्यादा ही चिंतित हैं. यहां के किसान खरीफ सीजन शुरू होने से पहले ही खेती की तैयारी में जुटे हैं. खेतों को खेती के लायक बनाने के लिए समतलीकरण, जुताई और मिट्टी पलटने जैसे काम किए जा रहे हैं. ये ज्यादातर काम ट्रैक्टर और डीजल से चलने वाली कृषि मशीनों से होते हैं. किसानों का कहना है कि बुवाई से पहले खेतों की दो से तीन बार जुताई करनी पड़ती है.
खेती का खर्च तेजी से बढ़ रहा है
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पारंपरिक धान खेती में यह बोझ और ज्यादा बढ़ जाता है. धान की रोपाई वाली खेती में खेतों की चार से पांच बार गीली जुताई और पडलिंग करनी पड़ती है, जिसके लिए ज्यादा डीजल और मशीनों का इस्तेमाल होता है. इससे किसानों की लागत और बढ़ रही है. किसानों का कहना है कि इन सभी कामों में ज्यादा डीजल खर्च होता है और ट्रैक्टर को लंबे समय तक चलाना पड़ता है, जिससे खेती का खर्च तेजी से बढ़ रहा है.
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फसल की थ्रेसिंग चार्ज भी महंगा
खेत तैयार करने के अलावा आने वाले महीनों में कटाई का खर्च भी बढ़ने की आशंका है. फसल कटाई के समय थ्रेसिंग (मड़ाई) के लिए ट्रैक्टर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. किसानों के मुताबिक पहले थ्रेसिंग का खर्च करीब 1,000 रुपये पड़ता था, लेकिन डीजल महंगा होने के बाद यह बढ़कर लगभग 1,500 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकता है. साथ ही ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की कमी के कारण अब कई किसान कटाई और मड़ाई के लिए मशीनों पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं. फिलहाल हार्वेस्टिंग मशीन चलाने वाले करीब 4,000 रुपये प्रति घंटे तक शुल्क ले रहे हैं. किसानों को डर है कि डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से आने वाले दिनों में यह खर्च और बढ़ सकता है.
किसानों पर कर्ज का खतरा बढ़ेगा
दरअसल, आंध्र प्रदेश के हजारों किसान सिंचाई के लिए पेट्रोल और डीजल से चलने वाले पंपों पर निर्भर हैं, खासकर बोरवेल और लिफ्ट सिंचाई वाले क्षेत्रों में. ऐसे में ईंधन महंगा होने से सिंचाई का खर्च भी बढ़ेगा, जिससे पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे किसानों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं. कृष्णा जिले के कविपुरम गांव के किसान के साईनाथ ने कहा कि सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए धान के MSP में सिर्फ 72 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है, जबकि पेट्रोल-डीजल महंगा होने से किसानों पर करीब 5,000रुपये प्रति एकड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि इससे किसानों का मुनाफा घटेगा और कर्ज बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाएगा.