तेजी से गिर रहा भूजल स्तर, पेयजल आपूर्ति पर गहरा सकता है संकट.. स्थिति बहुत गंभीर
हरियाणा के करनाल जिले में तेजी से गिरता भूजल स्तर चिंता का विषय बन गया है. धान की खेती के लिए प्रसिद्ध इस जिले में भूजल भंडार लगातार कम हो रहा है, जिससे खेती और पेयजल आपूर्ति पर संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है. फिलहाल सभी की निगाहें मॉनसून पर टिकी हैं, जिससे भूजल स्तर में सुधार की उम्मीद की जा रही है.
Haryana News: धान की खेती के लिए मशहूर हरियाणा के करनाल जिले में भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है. इससे किसानों और अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है. ऐसे में खेती और पेयजल आपूर्ति पर संकट गहरा सकता है. फिलहाल सभी की निगाहें मॉनसून पर टिकी हैं, जिससे भूजल स्तर में सुधार की उम्मीद की जा रही है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, करनाल जिले के अलग-अलग ब्लॉकों में भूजल स्तर की स्थिति काफी अलग-अलग है. मॉनसून के बाद करनाल ब्लॉक में औसत भूजल स्तर 16.18 मीटर दर्ज किया गया, जो मॉनसून से पहले 16.31 मीटर था. घरौंडा में यह 24.73 मीटर और नीलोखेड़ी में 28.08 मीटर दर्ज किया गया. वहीं, असंध और निसिंग सबसे ज्यादा जल संकट वाले क्षेत्र रहे, जहां भूजल स्तर क्रमशः 29.08 मीटर और 29.92 मीटर नीचे पहुंच गया. मुनक में यह स्तर 21.19 मीटर दर्ज किया गया. दूसरी ओर, इंद्री और कुंजपुरा में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, जहां भूजल स्तर क्रमशः 12.25 मीटर और 9.58 मीटर दर्ज किया गया. ये आंकड़े बताते हैं कि जिले के कई हिस्सों में भूजल तेजी से घट रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रों में स्थिति अभी भी अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है.
1974 में कितना था औसत भूजल स्तर
करनाल जिले में पिछले 50 वर्षों के दौरान भूजल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. वर्ष 1974 में जिले का औसत भूजल स्तर केवल 5.37 मीटर था, जो वर्ष 2000 में घटकर 8.57 मीटर रह गया. इसके बाद जून 2015 में यह 17.16 मीटर, जून 2024 में 20.80 मीटर और जून 2025 में 20.98 मीटर नीचे पहुंच गया. वहीं, अक्टूबर 2025 में यह और गिरकर 21.38 मीटर दर्ज किया गया, जो भूजल संकट की गंभीरता को दर्शाता है.
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भूजल का अत्यधिक दोहन
विशेषज्ञों का मानना है कि धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों की सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन और पर्याप्त जल पुनर्भरण (रिचार्ज) नहीं होना इस गिरावट की मुख्य वजह है. हरियाणा सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता डॉ. शिव सिंह रावत ने कहा कि करनाल जिले के सभी आठ ब्लॉकों को भूजल के अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्र घोषित किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि धान की खेती में बहुत अधिक पानी की जरूरत होती है, इसलिए किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने और कम पानी वाली फसलों की खेती की ओर बढ़ना चाहिए.
वर्षा जल संचयन को मिले बढ़ावा
करनाल में गिरते भूजल स्तर को सुधारने के लिए विशेषज्ञ और प्रशासन कई कदम उठा रहे हैं. वहीं, उपायुक्त आनंद कुमार शर्मा ने अधिकारियों को वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज प्रणालियों की नियमित देखभाल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों से भी ऐसे ढांचे स्थापित करने और उनका रखरखाव करने की अपील की है, ताकि अधिक से अधिक वर्षा जल का संरक्षण किया जा सके.