अरहर की खेती में आएगी नई क्रांति! ICAR की खोज से बढ़ेगा उत्पादन, महाराष्ट्र से यूपी तक किसानों को होगा फायदा
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अरहर की 'आशा' किस्म का देश का पहला पूरा T2T जीनोम तैयार कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इस खोज से अधिक उपज, जलवायु-अनुकूल और पोषक तत्वों से भरपूर नई किस्में विकसित होंगी, जिससे किसानों की आय और दलहन उत्पादन दोनों बढ़ेंगे.
भारत में अरहर की खेती और दलहन उत्पादन का भविष्य अब पहले से ज्यादा मजबूत दिख रहा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अरहर की लोकप्रिय ‘आशा’ किस्म का देश का पहला टेल-टू-टेल (T2T) रेफरेंस जीनोम तैयार कर कृषि अनुसंधान में नई इबारत लिख दी है. आसान शब्दों में कहें तो वैज्ञानिकों ने इस किस्म के पौधे का पूरा डीएनए पढ़ लिया है. इससे अब ऐसी नई अरहर किस्में विकसित करना आसान होगा जो अधिक पैदावार दें, कीट और बीमारियों का मुकाबला करें तथा सूखा और बढ़ते तापमान जैसी जलवायु चुनौतियों में भी बेहतर प्रदर्शन करें. इसका सीधा फायदा किसानों की आय, देश के दलहन उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को मिलेगा.
नई अरहर किस्मों का विकास होगा तेज, किसानों को मिलेगा फायदा
ICAR के अनुसार, इस उपलब्धि से वैज्ञानिकों को अरहर में पैदावार, रोग प्रतिरोधक क्षमता, पोषण गुणवत्ता और जलवायु सहनशीलता से जुड़े महत्वपूर्ण जीनों की सटीक पहचान करने में मदद मिलेगी. अब पारंपरिक और आधुनिक मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग के जरिए कम समय में बेहतर किस्में विकसित की जा सकेंगी. नई किस्मों में अधिक उत्पादन, कम फसल नुकसान और बेहतर गुणवत्ता मिलने की संभावना है. इससे किसानों की उत्पादन लागत कम होगी और प्रति एकड़ उपज बढ़ने से उनकी आय में भी वृद्धि होगी. साथ ही उच्च प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर अरहर विकसित होने से देश की पोषण सुरक्षा भी मजबूत होगी.
इन राज्यों में सबसे ज्यादा होगा असर
भारत में अरहर की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात और झारखंड में की जाती है. देश में लगभग 44 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है और हर साल 35 लाख टन से अधिक उत्पादन होता है. देश के कुल अरहर उत्पादन का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा इन्हीं राज्यों से आता है. नई तकनीक से विकसित उन्नत किस्में सबसे पहले इन्हीं प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. बेहतर बीज उपलब्ध होने पर कम पानी वाले क्षेत्रों में भी अरहर की खेती का विस्तार संभव होगा.
देश के दलहन उत्पादन को मिलेगी नई रफ्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैज्ञानिक सफलता भारत के दलहन उत्पादन में बड़ा बदलाव ला सकती है. पूरे जेनेटिक नक्शे की मदद से ऐसी किस्में विकसित होंगी जो प्रमुख कीटों और फफूंदजनित रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होंगी. सूखा, अत्यधिक गर्मी और बदलते मौसम से होने वाला नुकसान भी कम होगा. इससे उत्पादन अधिक स्थिर रहेगा और प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ेगी. बेहतर उत्पादकता के कारण देश की दालों के आयात पर निर्भरता घटेगी और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तेजी से हासिल करने में मदद मिलेगी.
विश्वस्तरीय शोध से खुलेंगे कृषि अनुसंधान के नए रास्ते
ICAR ने बताया कि तैयार किए गए इस T2T जीनोम में 75.26 करोड़ बेस पेयर शामिल हैं, जिन्हें 92 कंटिग्स में व्यवस्थित किया गया है. इसमें अरहर के सभी 11 गुणसूत्रों की पूरी जानकारी उपलब्ध है. शोध के दौरान 36,557 जीनों की पहचान की गई, जो 48,008 mRNA का निर्माण करते हैं. इसकी सटीकता 99.9 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है. इस जीनोम को NIPB_CcT2T_4 नाम से अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस NCBI में भी सुरक्षित किया गया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में भारत को दलहन अनुसंधान, नई किस्मों के विकास और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाएगी.