भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अरहर की खेती के लिए बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है. संस्थान ने भारत का पहला पूरी तरह तैयार टेलोमेयर-टू-टेलोमेयर (T2T) जीनोम विकसित किया है. यह जीनोम अरहर की ‘आशा’ किस्म का है. इससे वैज्ञानिकों को अरहर की पूरी आनुवंशिक (जेनेटिक) संरचना की सटीक जानकारी मिलेगी, जिससे बेहतर और अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी.
ICAR के अनुसार, इस जीनोम में करीब 75.26 करोड़ बेस पेयर की जानकारी शामिल है और इसे 92 हिस्सों (कॉन्टिग्स) में तैयार किया गया है. इसमें अरहर के सभी 11 गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) की पूरी संरचना दर्ज की गई है. इस जीनोम को NIPB CcT2T 4 नाम दिया गया है और इसे वैश्विक डेटाबेस NCBI में भी जमा कराया गया है. वैज्ञानिकों ने इस जीनोम में 36,557 जीन और 48,008 mRNA (कोडिंग सीक्वेंस) की पहचान की है. साथ ही, RNA परीक्षण में 99.9 प्रतिशत से अधिक सटीक मिलान मिला, जिससे यह साबित हुआ कि यह जीनोम बेहद सटीक और पूर्ण है. यह उपलब्धि भविष्य में रोग और जलवायु के प्रति अधिक सहनशील तथा ज्यादा उपज देने वाली अरहर की नई किस्में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
अरहर को तूर दाल के नाम से भी जाना जाता है
अरहर, जिसे देश के कई हिस्सों में तूर दाल के नाम से भी जाना जाता है, भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में से एक है. यह करोड़ों लोगों के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है और देश की खाद्य व पोषण सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती है. ICAR ने कहा कि वर्ष 2011 में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (NIPB) ने अरहर की ‘आशा’ किस्म का दुनिया का पहला ड्राफ्ट जीनोम तैयार किया था. यह पूरी तरह भारत में विकसित और अनुक्रमित (सीक्वेंस) किया गया पहला फसल जीनोम था. इसके बाद 2017 में इसका और बेहतर संस्करण जारी किया गया.
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किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी
अब तैयार किया गया पूरी तरह एनोटेटेड T2T जीनोम वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन होगा. इसकी मदद से अरहर में अधिक उपज, बेहतर पोषण, रोग प्रतिरोधक क्षमता और जलवायु परिवर्तन को सहने वाली नई किस्मों से जुड़े जीन की पहचान आसान होगी. साथ ही, आधुनिक तकनीकों जैसे मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग और जीन एडिटिंग का उपयोग कर बेहतर किस्में विकसित करने में भी तेजी आएगी. इससे भविष्य में किसानों की आय बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
अरहर की नई किस्में बढ़ाएंगी उत्पादन और पोषण
ICAR का कहना है कि अरहर का यह नया टेलोमेयर-टू-टेलोमेयर (T2T) जीनोम विकसित होने से भविष्य में ऐसी नई किस्में तैयार करने में तेजी आएगी, जो जलवायु परिवर्तन का बेहतर सामना कर सकें, अधिक उपज दें और पोषण से भरपूर हों. इससे देश के दलहन सुधार कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी. यह उपलब्धि वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी. साथ ही, फसल की उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार और देश की खाद्य व पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी.
दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
केंद्र सरकार भी देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रही है. इसी उद्देश्य से 2025-26 से 2030-31 तक के लिए ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ शुरू किया गया है. पिछले महीने ICAR के 98वें स्थापना दिवस पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वैज्ञानिकों से बिना जीएम (GMO) तकनीक का उपयोग किए दलहन की पैदावार बढ़ाने के नए समाधान विकसित करने का आह्वान किया था. उन्होंने कहा था कि जब दूसरे देश बिना जीएम बीजों के बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं, तो भारत भी ऐसा कर सकता है.