दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की दिशा में काम करने के केंद्र सरकार के निर्देशों पर कृषि वैज्ञानिकों ने कदम बढ़ा दिए हैं. केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े कृषि विश्वविद्यालयों को नई किस्में तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं. इस दिशा में उत्तराखंड के गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने 5 दलहन फसलों की उन्नत किस्मों को आपस में क्रॉस करके नई किस्में विकसित कर रहा है, जो मौसम के असर से सुरक्षित होंगी और कीट-बीमारियों का भी असर नहीं होगा. इससे इन किस्मों में कम लागत आएगी, जबकि उत्पादन पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ जाएगा.
कृषि मंत्री के निर्देश पर देशभर में नई किस्मों पर शोध जारी
देश ने जहां खाद्यान्न उत्पादन में 357 मिलियन टन का रिकॉर्ड कायम किया है, वहीं दलहन के मामले में अब भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसको लेकर चिंता जता चुके हैं. कृषि विकसित संकल्प यात्रा के तहत उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों को नए किस्मों, नस्लों पर शोध के निर्देश दिए हैं, जिसके बाद आईसीएआर का भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली ने सक्रियता बढ़ा दी है और आईसीएआर से संबद्ध कृषि विश्वविद्यालयों ने भी नई किस्मों को विकसित करना शुरू कर दिया है.
जीबी पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय ने 13 नई किस्में विकसित कीं
दलहन उत्पादन पर आत्मनिर्भरता इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 6 वर्षीय दलहन मिशन की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक उत्पादन को 252 लाख टन से बढ़ाकर 350 लाख टन करना है. इस अभियान में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर अहम भूमिका निभा रहा है. विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने बयान में कहा कि विश्वविद्यालय ने 13 उन्नत किस्में विकसित कर ली हैं. जबकि, रोग-रोधी दलहन प्रजातियों पर काम चल रहा है.
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चना-मटर समेत 5 दलहन फसलों की क्रॉस तकनीक से नई किस्म पर शोध जारी
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, शोधार्थी और प्राध्यापक दलहन की अधिक उपज देने वाली और रोग-रोधी प्रजातियों के विकास में जुटे हैं. पिछले तीन वर्षों में विश्वविद्यालय 13 उन्नत और अधिक उत्पादक प्रजातियां किसानों को समर्पित कर चुका है. निदेशक शोध डॉ. एसके वर्मा के अनुसार चना, अरहर, मटर, उड़द और मसूर की नई रोग-रोधी प्रजातियां विकसित की गई हैं, जो किसानों की पैदावार और आय बढ़ाने में सहायक होंगी.

पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति मनमोहन सिंह चौहान (ऊपर). निदेशक शोध डॉ. एसके वर्मा (नीचे).
उन्नत किस्मों से परागण के जरिए बन रहीं नई किस्में
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शोध वैज्ञानिकों के निर्देशन में शोधार्थी छात्रों को उन्नत किस्मों से क्रॉस कराकर नई किस्में विकसित कराने पर काम कराया जा रहा है. छात्रा मानवी बिष्ट मसूर किस्म में परागण के जरिए नई प्रजाति विकसित कर रही हैं, जो रोगों और कीटों के प्रकोप से मुक्त रहेगी. जबकि, शोधार्थी सार्थक चौधरी चना की उन्नत किस्मों के क्रॉस पर काम कर रहे हैं. वहीं वैष्णवी भट्ट पीली मटर के आयात को कम करने के लिए अधिक उपजाऊ प्रजाति पर शोध कर रही हैं. अगर ये प्रयास सफल होते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि किसानों की आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी होगी.