Pigeon Pea Farming: खरीफ सीजन शुरू होते ही किसान अरहर की बुवाई की तैयारी में जुट जाते हैं. अरहर देश की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है, जो न केवल किसानों को बेहतर आमदनी देती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार, अरहर की अच्छी पैदावार के लिए केवल उन्नत बीजों का चयन पर्याप्त नहीं है, बल्कि बुवाई से पहले भूमि का जैविक शोधन करना भी बेहद जरूरी है. इससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद, जीवाणु और कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है.
भूमि शोधन से मिलेगी स्वस्थ फसल
कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार बताते हैं कि अरहर एक दलहनी फसल है, जो वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का काम करती है. लेकिन यदि मिट्टी में पहले से रोगजनक फफूंद, कीट या हानिकारक जीव मौजूद हों तो फसल की वृद्धि प्रभावित हो सकती है. ऐसे में भूमि का जैविक शोधन सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है. इसके लिए किसान ट्राइकोडर्मा, बवेरिया बेसियाना और सूडोमोनास जैसे जैविक उत्पादों का उपयोग कर सकते हैं. इससे मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है और रोग फैलाने वाले जीवाणुओं तथा फफूंदों का प्रभाव कम होता है.
बुवाई से पहले ऐसे तैयार करें जैविक कल्चर
विशेषज्ञों के अनुसार, जैविक कल्चर तैयार करने के लिए ढाई किलोग्राम ट्राइकोडर्मा, ढाई से तीन किलोग्राम बवेरिया बेसियाना और इतनी ही मात्रा में सूडोमोनास को अलग-अलग 100 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाना चाहिए. इस मिश्रण को किसी छायादार स्थान पर रखकर प्रतिदिन हल्का पानी छिड़कना चाहिए. करीब 8 से 10 दिन बाद यह उपयोग के लिए तैयार हो जाता है. अंतिम जुताई के समय खेत में इसका प्रयोग किया जाता है. सबसे पहले ट्राइकोडर्मा, फिर बवेरिया बेसियाना और अंत में सूडोमोनास का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है. इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता मजबूत होती है और पौधों की जड़ें स्वस्थ रहती हैं.
नेमाटोड नियंत्रण के लिए अपनाएं ये उपाय
अरहर की फसल में नेमाटोड का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है. यह सूक्ष्म कीट पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचाकर उत्पादन को प्रभावित करता है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके नियंत्रण के लिए भूमि शोधन के समय एक से दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पेसिलोमायसिस का उपयोग किया जा सकता है. इसके अलावा 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की निबोली या नीम की खली खेत में मिलाने से भी नेमाटोड और अन्य हानिकारक कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है. यह पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल उपाय माना जाता है.
गहरी जुताई भी है प्रभावी समाधान
यदि किसानों के पास जैविक उत्पाद उपलब्ध नहीं हैं, तो गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है. गहरी जुताई से मिट्टी की निचली परतों में छिपे कीट, उनके अंडे और नेमाटोड धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं. कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार, भूमि शोधन, जैविक उपचार और गहरी जुताई जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान अरहर की फसल को रोगों और कीटों से सुरक्षित रख सकते हैं. इससे फसल स्वस्थ रहेगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिल सकेगा.