अनियमित बारिश और जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन आंध्र प्रदेश के ज्यादातर किसान अब भी धान की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की ओर नहीं जाना चाहते. एक नए अध्ययन में सामने आया है कि किसान वैकल्पिक फसलें अपनाने के बजाय पारंपरिक धान की खेती को बेहतर बनाने पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं. यह अध्ययन आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी, पश्चिमी गोदावरी और कृष्णा जिलों में किया गया. कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई तक राज्य में 5.94 लाख हेक्टेयर में धान की बुवाई हो चुकी थी, जो इस सीजन के सामान्य रकबे का 91 फीसदी है. यह दिखाता है कि अल नीनो जैसी परिस्थितियों और मौसम की चुनौतियों के बावजूद किसान अभी भी धान की खेती पर ही निर्भर हैं.
अध्ययन के मुताबिक, करीब 70 फीसदी किसान अब भी पारंपरिक तरीके से धान की खेती करना पसंद करते हैं. वहीं, 65.83 फीसदी किसानों ने कहा कि उन्हें दूसरी फसलों या वैकल्पिक खेती के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है. इसके अलावा 82.08 फीसदी किसानों ने बताया कि उन्होंने खेती के अलावा कमाई के दूसरे साधन नहीं अपनाए हैं, जबकि इन्हें जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने का एक अहम तरीका माना जाता है.
फसल नहीं बदली, खेती का तरीका बदल रहे किसान
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल सभी किसानों ने कहा कि वे गर्मियों में गहरी जुताई कर रहे हैं और अधिक उत्पादन देने वाली धान की उन्नत किस्मों की खेती अपना रहे हैं. इससे साफ है कि किसान फसल बदलने के बजाय धान की खेती को अधिक उत्पादक और मौसम के अनुकूल बनाने पर ध्यान दे रहे हैं. अध्ययन में सामने आया कि जलवायु परिवर्तन के अनुसार खेती में बदलाव अपनाने में किसानों की उम्र या खेती का अनुभव उतना अहम नहीं है, जितना उनकी शिक्षा, कृषि से होने वाली आय और खेती से जुड़ी सही जानकारी तक पहुंच. वहीं, जिन किसानों के पास ज्यादा जमीन है, वे जलवायु के अनुरूप नई तकनीकें अपनाने में अपेक्षाकृत कम सक्रिय पाए गए.
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करीब 21.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती
रिपोर्ट के मुताबिक, कई किसान कृषि विशेषज्ञों या सरकारी सलाहकार सेवाओं की बजाय दूसरे किसानों से मिली जानकारी पर अधिक भरोसा करते हैं. यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने वाली आधुनिक खेती की तकनीकों को अपनाने की रफ्तार धीमी रहती है. आंध्र प्रदेश में धान सबसे प्रमुख फसल है. राज्य में करीब 21.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है और सालाना लगभग 79 लाख टन उत्पादन होता है. लेकिन अनियमित बारिश, चक्रवात, बाढ़, लंबे सूखे और बढ़ते तापमान के कारण धान की खेती पर जोखिम लगातार बढ़ रहा है.
धान किसानों की सोच और चुनौतियों की पड़ताल
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए ‘आंध्र प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के प्रति धान किसानों के अनुकूलन व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक’ विषय पर यह अध्ययन किया गया. इसमें धान किसानों द्वारा अपनाए जा रहे उपायों और उनके फैसलों को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक पहलुओं का विश्लेषण किया गया. यह शोध आंध्र प्रदेश कृषि विभाग के जी. रविंद्र बाबू तथा इग्नू, नई दिल्ली के पीवीके ससीधर और निशा वर्गीज ने किया है, जिसे इंडियन जर्नल ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन में प्रकाशित किया गया.
जलवायु से लड़ाई में किसान कई मोर्चों पर कमजोर
यह सर्वे आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी, पश्चिमी गोदावरी और कृष्णा जिलों के छह मंडलों के 12 गांवों में किया गया. अध्ययन में किसानों के सामने जलवायु परिवर्तन से निपटने में आने वाली कई संस्थागत और आर्थिक चुनौतियां सामने आईं. रिपोर्ट के मुताबिक, 90 फीसदी किसानों ने धान के लिए मौसम आधारित फसल बीमा की सुविधा नहीं होने को सबसे बड़ी समस्या बताया. वहीं, करीब 89.6 फीसदी किसानों ने कीमतों में उतार-चढ़ाव को सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती माना. इसके अलावा 86.25 फीसदी किसानों ने अच्छी गुणवत्ता के बीज और उपयुक्त धान की किस्मों की कमी की बात कही, जबकि 74.16 फीसदी किसानों ने जलवायु के अनुकूल धान की खेती की तकनीकी जानकारी नहीं होने को बड़ी परेशानी बताया.
जलवायु परिवर्तन के अनुसार खेती में बदलाव चाहते हैं किसान
शोधकर्ताओं का कहना है कि किसान जलवायु परिवर्तन के अनुसार खेती में बदलाव करना चाहते हैं, लेकिन जानकारी की कमी उनकी सबसे बड़ी बाधा है. मौसम से जुड़ी समय पर जानकारी और आधुनिक खेती की तकनीकों की जानकारी मिलने से किसान बदलते मौसम के जोखिमों का बेहतर तरीके से सामना कर सकते हैं. अध्ययन में यह भी कहा गया है कि आंध्र प्रदेश की जलवायु में फसलों में कई तरह के रोग लगने का खतरा अधिक रहता है. ऐसे में फसल सुरक्षा और रोग प्रबंधन की जानकारी का अभाव भी किसानों की जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को कमजोर करता है.