बासमती से कम नहीं यह चावल! महाप्रसाद में होता है इस्तेमाल, पूरी दुनिया में है अलग पहचान

ओडिशा का कोरापुट काला जीरा चावल अपनी खास खुशबू, स्वाद और पौष्टिक गुणों के लिए प्रसिद्ध है. GI टैग मिलने के बाद इसकी मांग देश-विदेश में बढ़ी है. आदिवासी किसान पीढ़ियों से इसकी खेती कर रहे हैं. इस चावल का उपयोग पुरी के जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद में भी किया जाता है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मिलने की उम्मीद है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 3 Aug, 2026 | 05:27 PM

जब भी खुशबूदार चावल की बात होती है, तो सबसे पहले बासमती का नाम आता है. लेकिन ओडिशा के कोरापुट जिले का काला जीरा चावल भी अपनी शानदार खुशबू, बेहतरीन स्वाद और गुणवत्ता के लिए काफी मशहूर है. इसका इस्तेमाल पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में बनने वाले महाप्रसाद में भी किया जाता है. यही वजह है कि इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी मिल चुका है. कोरापुट का काला जीरा चावल अपने सुगंधित दानों, पौष्टिक गुणों और पारंपरिक पहचान के लिए जाना जाता है. लंबे समय से आदिवासी किसान इसकी खेती कर रहे हैं.

दरअसल, कोरापुट के पुजारीपुट स्थित जैविक श्री फार्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड ने ओडिशा सरकार के सहयोग से 11 जनवरी 2022 को GI पंजीकरण के लिए आवेदन किया था. इसके बाद 31 अगस्त 2023 को इस आवेदन का विज्ञापन भौगोलिक संकेतक (GI) रजिस्ट्री की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया. आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस चावल को 2 जनवरी 2024 को जीआई टैग मिला. इसका पंजीकरण चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने किया. खास बात यह है कि यह GI पंजीकरण 10 जनवरी 2032 तक वैध रहेगा.

काला जीरा चावल की क्या है खासियत

दरअसल, ओडिशा के कोरापुट जिले के आदिवासी किसान पीढ़ियों से काला जीरा चावल की खेती करते आ रहे हैं. ‘प्रिंस ऑफ राइस’ के नाम से मशहूर काला जीरा चावल अपनी खास खुशबू, बेहतरीन स्वाद और पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है. इसके दाने देखने में धनिया के बीज जैसे छोटे होते हैं. माना जाता है कि कोरापुट के आदिवासी समुदायों के पूर्वज हजारों वर्षों से इस चावल की खेती करते आ रहे हैं. अपने काले रंग, सुगंध, स्वाद और मुलायम बनावट के कारण यह चावल देश-विदेश के उपभोक्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय है.

बड़े पैमाने पर होती है काला जीरा चावल की खेती

ओडिशा के कोरापुट जिले के जयपुर (जेयपोर) क्षेत्र और आसपास के इलाकों में काला जीरा चावल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. इसकी खेती मुख्य रूप से टोला, पात्रापुट, पुजारीपुट, बालीगुड़ा और मोहुली गांवों में होती है. पारंपरिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, काला जीरा चावल याददाश्त बेहतर करने, मधुमेह नियंत्रित रखने, हीमोग्लोबिन बढ़ाने और शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में मददगार माना जाता है. इसके अलावा इसमें जीवाणुरोधी (एंटीबैक्टीरियल) और पाचन से जुड़े कई लाभकारी गुण भी बताए जाते हैं.

महाप्रसाद में इस्तेमाल होता है ऑर्गेनिक काला जीरा चावल

कोरापुट का ऑर्गेनिक काला जीरा चावल पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में बनने वाले महाप्रसाद में इस्तेमाल किया जाता है. मंदिर में महाप्रसाद तैयार करने के लिए इसी विशेष किस्म के ऑर्गेनिक चावल का उपयोग किया जाता है. पिछले साल जून में पहली बार 32 क्विंटल ऑर्गेनिक काला जीरा चावल कोरापुट से पुरी भेजा गया था. इसके बाद से इस चावल को मंदिर की धार्मिक परंपराओं से भी जोड़ा गया है.

1,365 एकड़ में किसान करतें हैं इसकी खेती

कोरापुट काला जीरा चावल की खेती लंबे समय से कोरापुट के छोटे और सीमांत आदिवासी किसान करते आ रहे हैं. खरीफ 2024 में कोरापुट के आठ ब्लॉकों के 1,800 से अधिक किसानों ने 1,365 एकड़ क्षेत्र में काला जीरा चावल की खेती की. पहली बार किसान समूहों द्वारा स्थापित स्वतंत्र मंडियों के माध्यम से 1,900 क्विंटल धान की सीधे खरीद भी की गई. इस साल प्रशासन ने काला जीरा चावल और अन्य पारंपरिक किस्मों की खेती का लक्ष्य बढ़ाकर 2,000 एकड़ कर दिया है. इससे अधिक किसानों को इस फसल से जुड़ने और बेहतर आय हासिल करने का अवसर मिलने की उम्मीद है.

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Published: 3 Aug, 2026 | 05:23 PM

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