उर्वरकों की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई सरकार की चिंता, खाद सब्सिडी पर पड़ सकता है बड़ा असर

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खाद सब्सिडी का बजट 1.71 लाख करोड़ रुपये तय किया था. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह खर्च काफी ज्यादा बढ़ सकता है. उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस शर्मा ने कहा कि सब्सिडी बिल बढ़ना तय है. हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं बताया कि अंतिम बढ़ोतरी कितनी होगी.

नई दिल्ली | Published: 19 May, 2026 | 08:45 AM

India fertiliser subsidy: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के कारण केंद्र सरकार की खाद सब्सिडी का खर्च तेजी से बढ़ सकता है. सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का खाद सब्सिडी बिल करीब 70 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है.

अगर मौजूदा अनुमान सही साबित होते हैं तो अगले वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का कुल खर्च 2.41 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यह पिछले कई वर्षों में सबसे ज्यादा सब्सिडी खर्चों में से एक होगा.

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद सबसे बड़ा खर्च

बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, इससे पहले भारत ने वर्ष 2022-23 में खाद सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च किया था. उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें अचानक बढ़ गई थीं. उस दौरान सरकार ने करीब 2.51 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी दी थी ताकि किसानों को महंगी खाद का बोझ न उठाना पड़े. अब पश्चिम एशिया संकट के कारण एक बार फिर वैसी ही स्थिति बनने लगी है.

सरकार ने रखा था 1.71 लाख करोड़ का बजट

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खाद सब्सिडी का बजट 1.71 लाख करोड़ रुपये तय किया था. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह खर्च काफी ज्यादा बढ़ सकता है. उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस शर्मा ने कहा कि सब्सिडी बिल बढ़ना तय है. हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं बताया कि अंतिम बढ़ोतरी कितनी होगी, लेकिन 70 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ने की संभावना से इनकार भी नहीं किया.

किसानों के लिए फिलहाल खाद की कमी नहीं

सरकार का कहना है कि बढ़ती लागत के बावजूद खरीफ सीजन के लिए खाद की उपलब्धता फिलहाल पर्याप्त है. अपर्णा एस शर्मा के अनुसार इस समय देश में खाद का भंडार कुल जरूरत का 51 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि आमतौर पर शुरुआती स्टॉक करीब 33 प्रतिशत रहता है. उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश के पास करीब 2 करोड़ टन से ज्यादा उर्वरक स्टॉक मौजूद है, जिससे किसानों को तत्काल किसी संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा.

रोजाना 80 हजार टन हो रहा उत्पादन

सरकार के अनुसार देश में उर्वरकों का घरेलू उत्पादन भी लगातार जारी है. फिलहाल लगभग 80 हजार टन प्रतिदिन उत्पादन हो रहा है. पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद अब तक 86.2 लाख टन उत्पादन दर्ज किया गया है. हालांकि यह पिछले साल के मुकाबले थोड़ा कम है. पिछले वर्ष इसी अवधि में करीब 93 लाख टन उत्पादन हुआ था. अधिकारियों का कहना है कि आने वाले महीनों में इस कमी को पूरा करने की कोशिश की जाएगी.

आयात के नए रास्ते तलाश रहा भारत

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद सरकार अब आयात के नए विकल्प तलाश रही है. विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है. अब तक करीब 22 लाख टन से ज्यादा उर्वरक भारत पहुंच चुके हैं.

सरकार ने समूह आधारित खरीद प्रणाली के जरिए 13.5 लाख टन डीएपी और करीब 7 लाख टन एनपीके कॉम्प्लेक्स खाद की व्यवस्था की है. इसके अलावा अमोनियम सल्फेट और अन्य कच्चे माल का भी आयात किया जा रहा है.

गैस आपूर्ति को लेकर सरकार आश्वस्त

सरकार ने कहा है कि यूरिया उत्पादन के लिए जरूरी गैस की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है. इससे घरेलू उत्पादन प्रभावित नहीं होगा. उर्वरक विभाग अन्य जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता पर भी लगातार नजर रख रहा है ताकि किसानों को समय पर खाद मिल सके.

किसानों पर महंगाई का असर बढ़ने की चिंता

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा. हालांकि सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी जारी रख सकती है, लेकिन इससे सरकारी खर्च काफी बढ़ जाएगा. कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि अगर हालात लंबे समय तक बने रहे तो खाद कंपनियों और किसानों दोनों पर असर पड़ सकता है.

सरकार ने कहा- स्थिति फिलहाल नियंत्रण में

उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस शर्मा ने कहा कि फिलहाल स्थिति मजबूत, स्थिर और नियंत्रण में है. सरकार लगातार बाजार और अंतरराष्ट्रीय हालात पर नजर बनाए हुए है. साथ ही सब्सिडी भुगतान भी हर सप्ताह किया जा रहा है ताकि खाद कंपनियों को किसी तरह की परेशानी न हो.

फिलहाल किसानों के लिए राहत की बात यह है कि खरीफ सीजन से पहले खाद की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचने पर आने वाले समय में चुनौतियां बढ़ सकती हैं.

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