बिहार में ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत, किसान कम करेंगे खाद का इस्तेमाल.. बढ़ेगी कमाई

बिहार में ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत की गई है, जिसका उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है. कृषि मंत्री ने 30 जून तक चलने वाले इस अभियान का शुभारंभ किया. योजना के तहत 38 जिलों में क्लस्टर, 800 कृषि सखी, प्रोत्साहन राशि और मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर जोर दिया जा रहा है. इससे खेती की लागत घटेगी और किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद है.

नोएडा | Updated On: 2 Jun, 2026 | 07:28 AM

Bihar News: बिहार में रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत की गई है. यह अभियान 30 जून तक चलेगा. सोमवार को पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन से कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सैकड़ों किसानों की मौजूदगी में इसका शुभारंभ किया. इस मौके पर मंत्री और किसानों ने संकल्प लिया कि वे अपने खेत की 25 प्रतिशत यानी एक चौथाई जमीन पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देंगे.

कृषि मंत्री ने कहा कि यह अभियान एक नए बदलाव की शुरुआत है, जो किसानों की खेती करने के तरीके और उनकी आमदनी दोनों को बेहतर बनाएगा. उन्होंने कहा कि रासायनिक खादों के अधिक उपयोग से जमीन को बचाना जरूरी है और प्राकृतिक खेती अपनाकर लोग अपने परिवार को स्वस्थ रख सकते हैं. कृषि मंत्री ने कहा कि गोबर, गोमूत्र और बीजामृत जैसे प्राकृतिक तरीकों से उगाई गई फसलें न सिर्फ बेहतर होती हैं, बल्कि ये सेहत के लिए भी फायदेमंद हैं और शरीर को ऊर्जा देती हैं. उन्होंने बताया कि रासायनिक खाद और उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है.

किसानों की आमदनी बढ़ेगी

मिट्टी की जांच से यह बात सामने आई है कि लगातार रसायनों के इस्तेमाल से जमीन में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है. उन्होंने कहा कि ‘खेत बचाओ अभियान’ सिर्फ मिट्टी को बचाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. कृषि मंत्री ने किसानों से अपील की कि वे ‘सही खाद और सही सलाह’ के मंत्र को अपनाएं. उन्होंने कहा कि किसान बिना जरूरत के उर्वरक का इस्तेमाल न करें और अपने खेत का मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाकर उसी के अनुसार खाद डालें. इससे खेती की लागत कम होगी और किसानों की आमदनी बढ़ेगी.

5,000 रुपये प्रोत्साहन राशि दी जा रही है

कृषि मंत्री ने बताया कि नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के तहत राज्य के सभी 38 जिलों में क्लस्टर बनाकर रासायनिक खाद मुक्त खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके लिए 800 ‘कृषि सखी’ (जीविका दीदी) का चयन किया गया है, जिन्हें हर महीने 5,000 रुपये प्रोत्साहन राशि  दी जा रही है. उन्होंने कहा कि वित्तीय वर्ष 2026-27 में सभी जिलों में 114 नए क्लस्टर और 5,700 हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के लिए शामिल किया जाएगा. इस योजना के तहत प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ (अधिकतम 1 एकड़ तक) की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी. साथ ही जैव उत्पादन संसाधन केंद्र (BRC) स्थापित करने के लिए 1 लाख रुपये की सहायता भी मिलेगी. प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण के लिए प्रति हेक्टेयर 2,100 रुपये का भुगतान भारत सरकार द्वारा तय रीजनल काउंसिल के माध्यम से किया जाएगा.

कम उपयोग करने की जरूरत है

इस मौके पर कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने कहा कि जैसे जंगल में न तो खाद डाली जाती है और न ही सिंचाई की जरूरत होती है, फिर भी वहां पेड़-पौधे प्राकृतिक रूप से पत्तियों और जैविक पदार्थों से पोषण पाते हैं और स्वस्थ रहते हैं. उन्होंने कहा कि इसी तरह खेती में भी प्राकृतिक तरीकों को अपनाने और रासायनिक उर्वरकों का कम से कम उपयोग करने की जरूरत है.

प्राकृतिक खेती को मिलेगा प्रोत्साहन

कार्यक्रम में कृषि विभाग और उससे जुड़े संस्थानों के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ अधिकारियों ने भी प्राकृतिक खेती को लेकर चल रही तैयारियों और अभियान की विस्तृत जानकारी दी. इस राष्ट्रीय अभियान को बिहार के हर गांव और पंचायत स्तर तक पहुंचाने के लिए कृषि विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ‘कम खाद, सही खाद और सही सलाह’ के सिद्धांत को हर खेत तक पहुंचाना है, ताकि रासायनिक उर्वरकों के अनियंत्रित उपयोग को रोका जा सके और खेती की लागत कम हो सके.

मिट्टी की जांच पर विशेष जोर दिया जाएगा

अभियान के दौरान पूरे राज्य में मिट्टी की जांच पर विशेष जोर दिया जाएगा. किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड  के आधार पर ही संतुलित मात्रा में खाद इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जाएगा. इसके साथ ही हरी खाद, प्राकृतिक खेती और जैविक उत्पादों के उपयोग को भी बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाएगा. जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए कृषि वैज्ञानिक सीधे खेतों में जाकर किसानों को व्यावहारिक सलाह देंगे. इसमें कम पानी वाली फसलों की खेती, फसल विविधीकरण और जोखिम प्रबंधन के आधुनिक तरीकों की जानकारी भी दी जाएगी.

Published: 2 Jun, 2026 | 07:27 AM

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