बरसात में पपीते की खेती पड़ सकती है भारी, कृषि वैज्ञानिक ने दी चेतावनी, बर्बाद हो सकता है पूरा बाग

Papaya Cultivation: पपीता एक लाभदायक फल फसल है, लेकिन बरसात के मौसम में इसकी खेती काफी जोखिम भरी मानी जाती है. भारी बारिश और जलभराव से जड़ सड़न, तना गलन, वायरस और फफूंदजनित रोग तेजी से फैलते हैं, जिससे पूरा बाग खराब हो सकता है. लगातार नमी के कारण कीटों का प्रकोप बढ़ता है, पौधों की बढ़वार रुकती है और उत्पादन में 20 से 50 फीसदी तक गिरावट आ सकती है.

नोएडा | Updated On: 23 Jun, 2026 | 07:30 PM

Papaya Farming: पपीता देश की सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली फल फसलों में से एक है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को अच्छा मुनाफा देती है और सालभर बाजार में इसकी मांग बनी रहती है. यही वजह है कि भारत आज दुनिया के सबसे बड़े पपीता उत्पादक देशों में शामिल है. देश में करीब 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है और हर साल 55 से 60 लाख टन तक उत्पादन प्राप्त होता है. बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.

लेकिन जितना लाभ पपीते की खेती में है, उतना ही जोखिम भी छिपा हुआ है. खासकर बरसात के मौसम में. कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि अगर सही सावधानी नहीं बरती गई तो कुछ दिनों की भारी बारिश किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है.

बरसात में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से जुड़े वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार पपीता ऐसी फसल है जो जलभराव बिल्कुल भी सहन नहीं कर पाती. इसकी जड़ें काफी कोमल और सतह के पास होती हैं. यदि पौधों के आसपास 24 घंटे से ज्यादा पानी जमा रहता है तो उन्हें बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है. आजकल मौसम का मिजाज भी तेजी से बदल रहा है. कम समय में भारी बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. ऐसे में पपीते की खेती पहले से ज्यादा जोखिम भरी होती जा रही है.

जलभराव से शुरू होती हैं बड़ी समस्याएं

बरसात में खेत में पानी भरने से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है.

रोगों और वायरस का बढ़ जाता है हमला

बरसात के मौसम में हवा में नमी 80 से 95 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. यह वातावरण रोगों के फैलाव के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है. इस दौरान एन्थ्रेक्नोज, ब्लैक स्पॉट, रिंग स्पॉट वायरस और लीफ कर्ल जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं. इन रोगों को नियंत्रित करने के लिए किसानों को बार-बार दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है.

पोषण की कमी से घट जाता है उत्पादन

पपीता तेजी से बढ़ने वाली फसल है, इसलिए इसे भरपूर पोषण चाहिए होता है. लेकिन लगातार बारिश होने पर मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व बह जाते हैं.

इसका असर सीधे फसल पर दिखाई देता है. पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, पौधों की बढ़वार रुक जाती है, फूल और छोटे फल झड़ने लगते हैं तथा फलों का आकार छोटा रह जाता है. कई मामलों में उत्पादन 20 से 50 प्रतिशत तक घट सकता है.

कीट भी बढ़ा देते हैं नुकसान

कृषि वैज्ञानिक प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार, बरसात के मौसम में एफिड (चेपा), सफेद मक्खी, मिलीबग, फल मक्खी, थ्रिप्स, स्लग और घोंघों का प्रकोप बढ़ जाता है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि एफिड और सफेद मक्खी जैसे कीट कई वायरस रोगों को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाने का काम करते हैं. इससे बीमारी तेजी से पूरे बाग में फैल सकती है.

तेज हवा और बारिश से टूट जाते हैं पौधे

पपीते का तना नरम और रसीला होता है. इसलिए तेज हवाओं, आंधी और भारी बारिश के दौरान पौधे झुक सकते हैं, टूट सकते हैं या जड़ समेत उखड़ सकते हैं. विशेष रूप से 3 से 8 महीने की उम्र वाले पौधे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. कई बार एक ही तूफान किसानों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा देता है.

फल बनने की प्रक्रिया पर भी पड़ता है असर

लगातार बारिश होने पर मधुमक्खियां कम सक्रिय रहती हैं, जिससे फूलों में परागण की प्रक्रिया प्रभावित होती है. इसके कारण फलों की संख्या कम हो सकती है और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है. ज्यादा नमी की वजह से फलों की मिठास, गुणवत्ता और लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता भी कम हो सकती है. ऐसे फलों को बाजार में अक्सर अच्छे दाम नहीं मिल पाते.

वहीं, बरसात के मौसम में खरपतवार (अनचाही घास) तेजी से बढ़ने लगती है, जो फसलों के साथ पानी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा करती है. लगातार बारिश से मिट्टी भी कड़ी हो सकती है, जिससे पौधों की जड़ों का विकास प्रभावित होता है और उनकी बढ़वार धीमी पड़ सकती है.

अगर पपीता लगाना ही हो तो ये सावधानियां जरूर अपनाएं

बरसात में पपीते की खेती करनी हो तो खेत में जल निकासी की मजबूत व्यवस्था होनी चाहिए. पौधों को 45 से 60 सेंटीमीटर ऊंची मेड़ों या उठी हुई क्यारियों पर लगाना चाहिए. खेत के चारों ओर नालियां बनानी चाहिए ताकि पानी जमा न हो. इसके अलावा केवल प्रमाणित और रोगमुक्त पौधों का चयन करें, समय-समय पर रोग और कीटों की निगरानी करें तथा पौधों को मजबूत सहारा दें ताकि तेज हवा में वे गिरें नहीं.

Published: 24 Jun, 2026 | 06:00 AM

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