MP में गेहूं खरीद घोटाला, फर्जी तरीके से बेच दिया 18000 क्विंटल अनाज.. 15 पटवारी निलंबित

मध्य प्रदेश में गेहूं खरीद से जुड़े कथित MSP घोटाले ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. जांच में फर्जी किसान पंजीकरण, भूमि रिकॉर्ड के दुरुपयोग और करोड़ों रुपये के अवैध लाभ की आशंका सामने आई है. मुरैना, भिंड और राजगढ़ में कार्रवाई तेज हो गई है, जबकि EOW पूरे नेटवर्क की जांच में जुटी है.

नोएडा | Updated On: 27 Jun, 2026 | 11:53 AM

Wheat Procurement Scam: मध्य प्रदेश में गेहूं खरीद से जुड़े एक बड़े कथित घोटाले का मामला सामने आया है. आरोप है कि कुछ लोगों ने किसानों के भूमि रिकॉर्ड का गलत इस्तेमाल कर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं बेचकर करोड़ों रुपये का फायदा उठाया. यह मामला मुरैना, भिंड और राजगढ़ जिलों में सामने आया है, जिसके बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने जांच शुरू कर दी है. वहीं, मामले में कार्रवाई करते हुए मुरैना जिले में 15 पटवारियों को निलंबित कर दिया गया है.

प्रारंभिक जांच में पता चला है कि आरोपियों ने दूसरे किसानों, जिनमें अनुसूचित जाति वर्ग के किसान भी शामिल हैं, के खसरा और सर्वे नंबर का इस्तेमाल कर खुद को किसान के रूप में पंजीकृत कराया. इसके बाद उन्होंने सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचकर भुगतान  प्राप्त किया. कहा जा रहा है कि आरोपी उत्तर प्रदेश से 2,200 से 2,400 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं खरीदते थे और फिर उसे मध्य प्रदेश में 2,600 रुपये प्रति क्विंटल के MSP पर बेच देते थे.अधिकारियों को आशंका है कि इस तरीके से करोड़ों रुपये का अवैध मुनाफा कमाया गया. मामले की जांच जारी है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है.

इस तरह हुआ फर्जीवाड़ा

एनडीटी की रिपोर्ट के मुताबिक, जांच अधिकारियों को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हो रही है कि यह कथित फर्जीवाड़ा आखिर सिस्टम की जांच प्रक्रिया से कैसे निकल गया. नियमों के अनुसार किसान पंजीकरण के दौरान आवेदक के नाम का मिलान भूमि रिकॉर्ड से किया जाना चाहिए था. यदि नाम और जमीन के रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी मिलती, तो पटवारी और तहसीलदार स्तर पर आवेदन खारिज कर दिया जाना चाहिए था. लेकिन आरोप है कि कई मामलों में स्पष्ट विसंगतियों के बावजूद पंजीकरण को तहसील स्तर पर मंजूरी दे दी गई. इसी वजह से अब जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे मामले में कहीं अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत तो नहीं थी.

पंजीकरण 5 से 10 मार्च के बीच रात को किया गया

यह मामला और भी गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि कई मामलों में न तो बटाई (शेयरक्रॉपिंग) से जुड़े वैध दस्तावेज थे, न ही असली जमीन मालिकों की लिखित सहमति और न ही आरोपियों के पास जमीन पर खेती करने का कोई कानूनी अधिकार था. इसके बावजूद उनके किसान पंजीकरण को मंजूरी दे दी गई. अधिकारियों के अनुसार, कथित घोटाले को काफी सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया. पंजीकरण एक ब्लॉक या सहकारी समिति में कराया जाता था, जबकि गेहूं की तौल दूसरे और दूर स्थित खरीद केंद्रों पर कराई जाती थी, ताकि गड़बड़ी आसानी से पकड़ में न आए. बताया जा रहा है कि पंजीकरण की अंतिम तिथि 10 मार्च थी और अधिकांश संदिग्ध पंजीकरण 5 से 10 मार्च के बीच रात 11 बजे से सुबह 7 बजे के दौरान किए गए.

18,000 क्विंटल से अधिक गेहूं की बिक्री

जांच में पैसों के लेन-देन को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए हैं. जिन जमीनों के रिकॉर्ड का इस्तेमाल पंजीकरण के लिए किया गया, वे दूसरे किसानों के नाम पर थे, लेकिन MSP का भुगतान सीधे कथित आरोपियों के बैंक खातों में जमा किया गया. इससे पूरे मामले में बड़े स्तर पर फर्जीवाड़े और मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है. जांच एजेंसियों ने अब तक इस कथित नेटवर्क के जरिए 18,000 क्विंटल से अधिक गेहूं की बिक्री का पता लगाया है. मामले में कार्रवाई करते हुए मुरैना जिले में 15 पटवारियों को निलंबित कर दिया गया है. वहीं, जौरा और बानमोर के दो तहसीलदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं. भिंड जिले में भी चार कथित फर्जी किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है.

फर्जी पंजीकरण होने की गोपनीय शिकायत मिली

भिंड में इस मामले की जांच तब शुरू हुई, जब कलेक्टर किरोड़ी लाल मीणा को गेहूं खरीद में बड़े पैमाने पर फर्जी पंजीकरण होने की गोपनीय शिकायत मिली. शिकायत को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने खाद्य निरीक्षक सुनील कुमार मुद्गल को विस्तृत जांच के निर्देश दिए. जांच के दौरान जब खाद्य विभाग की किसान पंजीकरण सूची का मिलान राजस्व विभाग के भूमि रिकॉर्ड से किया गया, तो कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. इसके बाद अधिकारियों को बड़े स्तर पर फर्जीवाड़े की आशंका हुई और पूरे नेटवर्क की जांच शुरू की गई.

Published: 27 Jun, 2026 | 11:49 AM

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