यूपी में पिछले साल से दोगुनी गेहूं खरीद, फिर भी नहीं पूरा हुआ टारगेट.. 20 लाख टन पर अटका आंकड़ा

बंपर उत्पादन के बावजूद उत्तर प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद लक्ष्य से पीछे रह गई है. 25 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 19.86 लाख मीट्रिक टन खरीद हुई है. खुले बाजार में बेहतर कीमत, निजी व्यापारियों को किसानों की प्राथमिकता और एमएसपी से ऊपर भाव इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं.

नोएडा | Updated On: 12 Jun, 2026 | 11:19 AM

Wheat Procurement: बंपर उत्पादन और सरकारी प्रयासों के बावजूद उत्तर प्रदेश में गेहूं की खरीद उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाई है. 15 जून को समाप्त हो रहे रबी विपणन सत्र में अब तक केवल 19.86 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हुई है, जो 25 लाख मीट्रिक टन के संशोधित लक्ष्य से काफी कम है. देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य में खरीद की यह स्थिति सरकार और खाद्य विभाग के लिए चिंता का विषय बन गई है. हालांकि यह पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक खरीद है और पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी है, फिर भी देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य के लिए यह आंकड़ा काफी कम माना जा रहा है.

अधिकारियों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में कमजोर खरीद  को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए उत्तर प्रदेश का शुरुआती खरीद लक्ष्य केवल 10 लाख मीट्रिक टन तय किया था, जो हाल के वर्षों में सबसे कम था. लेकिन बंपर फसल और खरीद व्यवस्था मजबूत होने की उम्मीद के आधार पर राज्य सरकार ने केंद्र से लक्ष्य बढ़ाने की मांग की, जिसके बाद इसे बढ़ाकर 25 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया. इसके बावजूद राज्य लक्ष्य हासिल करने से काफी पीछे रह गया है.

5,848 खरीद केंद्र बनाए गए

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गेहूं खरीद को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में 5,848 खरीद केंद्र बनाए गए थे. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं बेचने के लिए 6.82 लाख किसानों ने खाद्य एवं रसद विभाग में पंजीकरण कराया था. अधिकारियों के अनुसार, बेमौसम बारिश से कुछ क्षेत्रों में गेहूं की गुणवत्ता प्रभावित होने के बाद केंद्र सरकार ने खरीद मानकों में भी छूट दी थी. किसानों को ऐसे गेहूं को भी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल के पूर्ण एमएसपी पर बेचने की अनुमति दी गई थी.

केंद्र सरकार उठाती है भुगतान का खर्च

गेहूं खरीद व्यवस्था के तहत राज्य सरकारें केंद्र सरकार की ओर से किसानों से गेहूं खरीदती हैं. किसानों को भुगतान का खर्च केंद्र सरकार उठाती है. इसके बाद खरीदा गया गेहूं केंद्रीय भंडार (सेंट्रल पूल) में भेज दिया जाता है, जहां से उसे विभिन्न राज्यों को खाद्य सुरक्षा योजनाओं के तहत वितरण के लिए आवंटित किया जाता है. उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (खाद्य एवं रसद)  रणवीर प्रसाद ने कहा कि गेहूं खरीद  कम रहने के पीछे कई कारण हैं. कई इलाकों में खुले बाजार में गेहूं के दाम एमएसपी से अधिक रहे, निजी व्यापारियों ने किसानों को तुरंत भुगतान किया और किसानों को खरीद केंद्रों तक फसल ले जाने के बजाय सीधे व्यापारियों को बेचना ज्यादा सुविधाजनक लगा.

15 जून तक होगी गेहूं खरीदी

उन्होंने कहा कि कई किसान भविष्य में कीमतें बढ़ने की उम्मीद में अपना गेहूं रोककर भी रख रहे हैं. रणवीर प्रसाद के अनुसार, सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को एमएसपी से कम कीमत पर फसल बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े. यदि किसानों को खुले बाजार में एमएसपी से बेहतर दाम मिल रहे हैं, तो यह उनके लिए फायदेमंद है. रणवीर प्रसाद ने दावा किया कि किसानों के हित में उठाए गए कई कदमों की वजह से इस वर्ष गेहूं की सरकारी खरीद  पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक रही है. उन्होंने कहा कि सरकार ने किसानों को अपनी उपज सरकारी एजेंसियों को बेचने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कई सुविधाएं और व्यवस्थाएं की थीं. उन्होंने बताया कि 15 जून को खरीद सत्र समाप्त होने तक राज्य में कुल गेहूं खरीद करीब 20 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) तक पहुंचने की उम्मीद है.

 

Published: 12 Jun, 2026 | 10:22 AM

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