कम बारिश के अलर्ट के बाद भी मूंगफली की खेती क्यों बढ़ा रहे किसान? दांव खेलने के पीछे कई फैक्टर

किसानों का कहना है कि प्री मॉनसून में अच्छी बारिश के चलते नमी का फायदा उठाने के लिए उन्होंने मूंगफली, मूंग और बाजरा की बुवाई की है. उन्हें उम्मीद है कि इससे उन्हें अच्छी उपज मिलेगी और पशुओं के लिए चारे की जरूरत भी पूरी होगी. हालांकि, अब वे बारिश का इंतजार बेसब्री से कर रहे हैं.

नोएडा | Published: 2 Jul, 2026 | 02:16 PM

मानसूनी बारिश की अनिश्चितता के बीच राजस्थान के किसानों ने मूंगफली की खेती पर बड़ा दांव लगाया है. जबकि, मूंगफली ज्यादा पानी लागत वाली फसल है और कृषि वैज्ञानिक कम पानी लागत वाली और सूखा झेलने में सक्षम फसलों की खेती पर जोर दे रहे हैं. नागौर बेल्ट में तिलहन और दलहन फसलों की बुवाई पर किसानों का इस सीजन भी जोर है. राज्य कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून के अंत तक मूंगफली की बुवाई का रकबा बढ़कर 7.13 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले सीजन की तुलना में 23 फीसदी ज्यादा है. हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर मूंगफली की बुवाई में जोरदार गिरावट दर्ज की गई है.

राजस्थान के नागौर जिले के साथ ही आसपास के हिस्सों में किसान दलहन और तिलहन फसलों की जमकर खेती करते हैं. इस बार अल नीनो के असर से कम मॉनसूनी के अलर्ट के बावजूद किसान इन फसलों की बुवाई कर रहे हैं. इसमें खासकर मूंगफली की बुवाई की जा रही है. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार नागौर के

राजस्थान में मूंगफली का रकबा बढ़ा

किसानों की इन उम्मीदों के चलते मूंगफली के रकबे में उछाल दर्ज किया गया है. राज्य कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून के अंत तक मूंगफली की बुवाई का रकबा 23.57 फीसदी बढ़कर 7.13 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह केवल 5.76 लाख हेक्टेयर था. कम बारिश और सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं होने के बावजूद रकबे में बढ़ोत्तरी का दांव किसानों को उलटा पड़ सकता है. क्योंकि, मूंगफली खूब पानी लागत वाली फसल है. अब यहां के किसान मानसूनी बारिश के समय पर होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

मूंगफली की ज्यादा बुवाई करने की वजहें दमदार

मूंगफली की ज्यादा बुवाई करने के पीछे किसानों का तर्क है कि दूसरी दो फसलों की तुलना में इसमें ज्यादा लाभ होता है. भले ही कम बारिश के कारण पैदावार कम हो जाए. मूंग के मुकाबले मूंगफली से ज्यादा कमाई होती है. क्योंकि, एक हेक्टेयर में 10 क्विंटल पैदावार मिलती है और पशुओं के लिए पौष्टिक चारा भी हासिल होता है. कृषि अधिकारियों का भी मानना है कि कपास के बाद मूंगफली राज्य की सबसे प्रमुख नकदी फसल है. बेहतर मुनाफे के कारण कई किसानों ने इस बार भी इसकी बुवाई की है.

फसल तय करने में कई फैक्टर पर विचार करने लगे हैं किसान

खास बात यह है कि मूंगफली की ओर यह झुकाव तब देखा जा रहा है जब मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) अधिक है. फसल वर्ष 2026-27 (जुलाई-जून) के लिए, मूंगफली का MSP 7,517 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि मूंग का MSP 8,780 रुपये प्रति क्विंटल और बाजरा का 2,900 रुपये प्रति क्विंटल है. यह पैटर्न बताता है कि किसान फसल तय करते समय केवल MSP के बजाय उत्पादन, बाजार की कुल मांग और मुनाफे के साथ ही फसल अवशेष के इस्तेमाल पर भी विचार कर रहे हैं.

देशभर में मूंगफली बुवाई का रकबा

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार जून के अंत तक देश में राष्ट्रीय स्तर पर मूंगफली की बुवाई के रकबे में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इस अब तक 8.87 लाख हेक्टेयर में मूंगफली की बुवाई की गई है. जो बीते साल के 15.29 लाख हेक्टेयर रकबे की तुलना में 6.42 लाख हेक्टेयर कम है. इसकी वजह राजस्थान को छोड़कर अन्य राज्यों में किसानों का मूंगफली की बजाय पिपरमेंट, डीएसआर धान और मक्का समेत अन्य कम पानी लागत वाली फसलों की खेती पर झुकाव होना माना गया है.

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