WTO Agreement: समुद्र में मछली पकड़ने के नियम बदले, भारत ने लिया बड़ा फैसला, मछुआरों पर क्या होगा असर?

WTO Fishing Deal: भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के फिशरीज सब्सिडी समझौते (AFS) को आधिकारिक मंजूरी दे दी है. इस समझौते का मकसद अवैध तरीके से मछली पकड़ने और समुद्र में जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने को बढ़ावा देने वाली सरकारी सब्सिडी पर रोक लगाना है. सरकार का कहना है कि इस फैसले से समुद्री मछलियों का संरक्षण होगा.

नोएडा | Published: 21 Jul, 2026 | 11:51 AM

WTO Fisheries Subsidies Agreement: भारत ने समुद्री मत्स्य क्षेत्र (फिशरीज) से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते को मंजूरी दे दी है. भारत अब विश्व व्यापार संगठन (WTO) के फिशरीज सब्सिडी एग्रीमेंट (Agreement on Fisheries Subsidies – AFS) का हिस्सा बन गया है. इस समझौते का मकसद समुद्र में अवैध तरीके से मछली पकड़ने और जरूरत से ज्यादा दोहन पर लगाम लगाना है, ताकि समुद्री संसाधनों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके.

वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत ने 20 जुलाई 2026 को इस समझौते को औपचारिक रूप से स्वीकार किया. जिनेवा में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने WTO की महानिदेशक न्गोजी ओकोंजो-इवेला को भारत की स्वीकृति सौंपी.

क्या है फिशरीज सब्सिडी एग्रीमेंट?

यह समझौता समुद्र में होने वाली मछली पकड़ने की गतिविधियों पर लागू होगा. इसके तहत उन कार्यों को सरकारी सब्सिडी नहीं दी जाएगी, जो अवैध मछली पकड़ने, बिना अनुमति के शिकार करने या समुद्री मछलियों के जरूरत से ज्यादा दोहन को बढ़ावा देती हैं. हालांकि, मछली पालन (Aquaculture) और नदियों, तालाबों व झीलों में होने वाली मत्स्य पालन गतिविधियां (Inland Fisheries) इस समझौते के दायरे में नहीं आतीं. इसलिए इन क्षेत्रों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.

छोटे मछुआरों को कैसे होगा फायदा?

भारत में ज्यादातर मछुआरे छोटे स्तर पर काम करते हैं. सरकार का कहना है कि यह समझौता ऐसे पारंपरिक और छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा करेगा. इससे बड़ी औद्योगिक कंपनियों को मिलने वाली ऐसी सब्सिडी पर रोक लगेगी, जिससे समुद्री संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होता है. इससे समुद्र में मछलियों की संख्या बनाए रखने में मदद मिलेगी और छोटे मछुआरों को भविष्य में भी पर्याप्त संसाधन मिलते रहेंगे.

भारत के समुद्री निर्यात पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

भारत के समुद्री खाद्य निर्यात में झींगा (Shrimp) की बड़ी हिस्सेदारी है. खास बात यह है कि भारत का अधिकांश झींगा एक्वाकल्चर के जरिए तैयार किया जाता है, जो इस समझौते के दायरे में नहीं आता.

यानी भारत के सी-फूड एक्सपोर्ट पर इस फैसले का कोई बड़ा नकारात्मक असर पड़ने की संभावना नहीं है. सरकार का मानना है कि इससे भारतीय समुद्री उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहेंगे.

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम

यह समझौता जून 2022 में जिनेवा में हुई WTO की 12वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सभी सदस्य देशों की सहमति से अपनाया गया था. इसे WTO का पहला ऐसा बहुपक्षीय समझौता माना जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और समुद्री संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल सुनिश्चित करना है. 15 सितंबर 2025 से यह समझौता लागू हुआ था. इसके प्रभावी होने के लिए WTO के दो-तिहाई सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी थी, जिसके बाद यह कानूनी रूप से लागू हो गया.

भारत की नीति पहले से ही इस दिशा में थी

सरकार का कहना है कि भारत की मौजूदा मत्स्य प्रबंधन व्यवस्था पहले से ही इस समझौते के अनुरूप है. देश में पारंपरिक मछुआरों के हितों की रक्षा और समुद्री संसाधनों के संतुलित उपयोग पर लगातार काम किया जा रहा है. भारत के इस समझौते में शामिल होने से एक तरफ समुद्री जैव विविधता को संरक्षण मिलेगा, वहीं दूसरी ओर छोटे मछुआरों के हित भी सुरक्षित रहेंगे. सरकार का मानना है कि, इससे टिकाऊ मत्स्य पालन को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में समुद्री संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव हो सकेगा.

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