एयर पॉल्यूशन खत्म करने में मददगार होंगे फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल, शहरों की हवा साफ होगी 

AIr Pollution: एक दशक पहले भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग काफी सीमित थी. लेकिन अब यह प्रोग्राम तेजी से बढ़ा है क्योंकि सरकार ने घरेलू इथेनॉल प्रोडक्शन को बढ़ावा दिया और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने ब्लेंडिंग टारगेट बढ़ा दिए. इससे वाहनों से निकलने वाला धुआं कम करने में मदद मिलेगी, जो प्रदूषण कम करने में मददगार होगी.

नोएडा | Published: 11 Mar, 2026 | 04:32 PM

भारत की एयर पॉल्यूशन की चुनौती अब सिर्फ सीजनल बढ़ोतरी तक ही सीमित नहीं है. कई बड़े शहरों में लाखों छोटी गाड़ियों से निकलने वाला एमिशन लगातार हवा की क्वालिटी को खराब कर रहा है. जबकि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर लंबे समय का बदलाव तेजी पकड़ रहा है, यह भी साफ होता जा रहा है कि भारत को शायद कई समाधानों को एक साथ काम करने की जरूरत होगी.

इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने कहा कि फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल (FFV) ज्यादा इथेनॉल ब्लेंड पर चलने में सक्षम हैं. खास बात यह है कि वे भारत के बढ़ते इथेनॉल इकोसिस्टम पर आधारित हैं, जिसने देश को 2025-26 तक पेट्रोल (E20) में 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग के अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ने में मदद की है. क्योंकि यह सप्लाई चेन पहले से ही पूरे देश में विकसित हो रही है, FFV पूरी तरह से नए फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत के बिना इथेनॉल ब्लेंडिंग के फायदों को बढ़ा सकते हैं.

छोटी पेट्रोल गाड़ियों से बढ़ रहा प्रदूषण

ISMA ने कहा कि भारत की सड़कों पर खासकर घने शहरी इलाकों में दोपहिया और छोटी पेट्रोल कारें ही चलती हैं. ये गाड़ियां अक्सर भीड़भाड़ वाले ट्रैफिक में चलती हैं, जहां इंजन बार-बार बंद रहते हैं, जिससे शहर की पहले से ही प्रदूषित हवा में एमिशन जमा हो जाता है. यह देखा गया है कि पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में ज्यादा इथेनॉल ब्लेंड कुछ खास टेलपाइप पॉल्यूटेंट्स को कम करते हैं. इथेनॉल ब्लेंडिंग रोलआउट के दौरान बताए गए सरकारी असेसमेंट के अनुसार E20 फ्यूल कार्बन मोनोऑक्साइड एमिशन और दूसरे पॉल्यूटेंट्स को काफी कम कर सकता है, खासकर टू-व्हीलर और पैसेंजर गाड़ियों में.

भारत ने पहले ही ज्यादातर इथेनॉल इकोसिस्टम बना लिया

एक दशक पहले भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग काफी सीमित थी. लेकिन अब यह प्रोग्राम तेजी से बढ़ा है क्योंकि सरकार ने घरेलू इथेनॉल प्रोडक्शन को बढ़ावा दिया और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने ब्लेंडिंग टारगेट बढ़ा दिए. इस वजह से भारत की इथेनॉल ब्लेंडिंग दर लगातार बढ़ी है, और हाल ही में 20 फीसदी नेशनल ब्लेंडिंग माइलस्टोन के करीब पहुंच गई है. इस बदलाव को सपोर्ट करने के लिए चीनी मिलों और दूसरे प्रोड्यूसर्स ने कई राज्यों में डिस्टिलरी कैपेसिटी में भारी इन्वेस्ट किया है. फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल्स से गाड़ियां बस ऐसे फ्यूल सप्लाई सिस्टम से ज्यादा इथेनॉल ब्लेंड इस्तेमाल कर पाएंगी जो पहले से ही बढ़ रहा है.

भारत के क्लीन मोबिलिटी ट्रांजिशन के लिए कॉस्ट अहम

इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के अनुसार भारतीय कंज्यूमर्स के लिए गाड़ी का अफोर्डेबिलिटी एक अहम फैक्टर बना हुआ है. यही एक वजह है कि देश के क्लीन मोबिलिटी में ट्रांजिशन में एक ही तरीके पर निर्भर रहने के बजाय कई तरह की टेक्नोलॉजी शामिल होंगी. फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल्स की कीमत कन्वेंशनल पेट्रोल गाड़ियों से थोड़ी ज्यादा होने की उम्मीद है क्योंकि ज्यादा इथेनॉल ब्लेंड को अकोमोडेट करने के लिए इंजीनियरिंग की जरूरत होती है. इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि एक्स्ट्रा कॉस्ट टू-व्हीलर्स के लिए लगभग 10,000 रुपये से 15,000 रुपये और पैसेंजर कारों के लिए 50,000 रुपये से 75,000 रुपये तक हो सकती है.

अगर टारगेटेड टैक्स रैशनलाइजेशन या पॉलिसी इंसेंटिव से सपोर्ट मिलता है, तो यह अंतर और कम हो सकता है, जिससे FFVs खरीदारों के एक बड़े हिस्से के लिए एक्सेसिबल बने रहेंगे.

इथेनॉल मोबिलिटी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत

इथेनॉल प्रोग्राम का एक और पहलू है खेती, जिस पर अक्सर मोबिलिटी पर होने वाली चर्चाओं में कम ध्यान दिया जाता है. भारत का शुगर सेक्टर लगभग 5.5 करोड़ गन्ना किसानों को सपोर्ट करता है और इथेनॉल प्रोडक्शन में बढ़ोतरी ने गन्ने से बने फीडस्टॉक के लिए एक और और ज्यादा स्टेबल आउटलेट बनाया है. जिन सालों में चीनी का प्रोडक्शन खपत से ज्यादा होती है, फसल का कुछ हिस्सा इथेनॉल की तरफ मोड़ने से कीमतें स्थिर करने और किसानों की इनकम को सपोर्ट करने में मदद मिल सकती है.

देश में E20 पेट्रोल की उपलब्धता आसान

देश की बायोफ्यूल स्ट्रैटेजी के हिस्से के तौर पर भारत के मौजूदा फ्यूल स्टेशनों के नेटवर्क के जरिए इथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल पहले से ही बांटा जा रहा है. देश के कई इलाकों में E20 पेट्रोल की बढ़ती उपलब्धता के साथ इथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल का पूरे देश में रोलआउट यह दिखाता है कि बेसिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पहले से ही मौजूद है. इससे FFVs को मौजूदा फ्यूल इकोसिस्टम में इंटीग्रेट करना उन टेक्नोलॉजी की तुलना में आसान हो जाता है जिनके लिए पूरी तरह से नए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है.

भारत के क्लीन मोबिलिटी ट्रांजिशन में शायद कई टेक्नोलॉजी का कॉम्बिनेशन शामिल होगा. इलेक्ट्रिक व्हीकल का विस्तार जारी रहेगा. खासकर उन सेगमेंट में जहां चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी इकोनॉमिक्स समझ में आते हैं.  साथ ही ऐसे सॉल्यूशन जो पहले से मौजूद सिस्टम का इस्तेमाल करके सुधार ला सकते हैं, उन पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है. फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल इसी कैटेगरी में आते हैं.

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