पंजाब-हरियाणा में पराली पर निगरानी फेल? सैटेलाइट आंकड़े और जमीनी हकीकत में फर्क, जांच होगी

Stubble Burning: पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की निगरानी को लेकर सैटेलाइट से मिले आंकड़ों और जमीन पर हुई जांच में अंतर सामने आया है. जले हुए खेतों का सही क्षेत्रफल पता लगाने वाली व्यवस्था अभी पूरी तरह जांची नहीं गई है. अब वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन आने वाले खरीफ मौसम में इसकी दोबारा जांच करेंगे.

नोएडा | Published: 7 Sep, 2026 | 04:11 PM

Punjab-Haryana Stubble Burning: दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले वायु प्रदूषण की एक बड़ी वजह खेतों में पराली जलाना भी है. खासकर पंजाब और हरियाणा में धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाने के मामले सामने आते हैं. इन घटनाओं पर नजर रखने के लिए सरकार सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरों और आंकड़ों का इस्तेमाल करती है. लेकिन अब इन आंकड़ों की सही जानकारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी CAQM के मुताबिक, सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों और उनसे मिले आंकड़ों से जो जानकारी मिल रही है और जमीन पर जाकर की गई जांच में अंतर पाया गया है. इसी वजह से अब इस पूरी व्यवस्था की दोबारा जांच करने का फैसला लिया गया है.

सैटेलाइट और जमीन की जांच में मिला अंतर

CAQM ने खेतों में जली पराली का पता लगाने के लिए एक खास व्यवस्था बनाई है. इससे पता लगाया जाता है कि किसी खेत का कितना हिस्सा जल चुका है. हालांकि, 2025 के खरीफ मौसम और 2026 के रबी मौसम में जब अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों और उनसे मिले आंकड़ों मिली जानकारी की जमीन पर जाकर जांच की गई, तो दोनों आंकड़ों में अंतर पाया गया. इसी को देखते हुए CAQM अब इस व्यवस्था में जरूरी बदलाव करने की कोशिश कर रहा है. आयोग और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के तहत काम करने वाला राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र आने वाले खरीफ मौसम में इस व्यवस्था की एक बार फिर जांच करेगा.

पराली का सही आंकड़ा मिलना क्यों जरूरी?

धान की कटाई के बाद आमतौर पर 15 सितंबर से 30 नवंबर के बीच पराली जलाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. इसी दौरान दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होने लगती है. कुछ दिनों में खेतों में जलाई जाने वाली पराली से निकलने वाला धुआं दिल्ली-एनसीआर के कुल प्रदूषण में 35 प्रतिशत तक हिस्सा डाल सकता है. ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि वास्तव में कितने खेतों में पराली जलाई गई और कितने हिस्से में आग लगी. अगर सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों में कुछ आग की घटनाएं छूट जाती हैं या जले हुए खेत के क्षेत्रफल का सही अंदाजा नहीं लग पाता, तो प्रदूषण की असली स्थिति समझना मुश्किल हो सकता है. साथ ही पराली जलाने वालों पर सही तरीके से कार्रवाई करना भी चुनौती बन जाता है.

पहले भी उठ चुके हैं आंकड़ों पर सवाल

सीएक्यूएम (CAQM) कृषि मंत्रालय से जुड़े विभागों के साथ मिलकर खेतों में लगने वाली आग पर नजर रखता है. इसके लिए अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों और उनसे मिले आंकड़ों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन 2024 से ही इस व्यवस्था की एक कमी पर सवाल उठते रहे हैं. दरअसल, सैटेलाइट किसी इलाके के ऊपर से कुछ तय समय पर ही गुजरता है. ऐसे में उसके गुजरने के बीच खेत में लगी आग कई बार तस्वीरों में दर्ज नहीं हो पाती. इस वजह से पराली जलाने की घटनाओं की संख्या वास्तविक आंकड़े से कम दिखाई देने की आशंका जताई गई है. यह मुद्दा उच्चतम न्यायालय में भी उठ चुका है.

नई व्यवस्था से क्या होगा फायदा?

इसी कमी को दूर करने के लिए जले हुए खेतों के पूरे हिस्से की पहचान करने वाली व्यवस्था तैयार की गई है. इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और पंजाब-हरियाणा के राज्य सुदूर संवेदन केंद्रों ने मिलकर तैयार किया है. इसमें यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता है. इन तस्वीरों के जरिए खेतों में जले हुए हिस्से की पहचान की जाती है. यह व्यवस्था करीब 20 मीटर गुणा 20 मीटर के छोटे हिस्से तक में जली पराली का पता लगाने में मदद कर सकती है.

अब फिर होगी व्यवस्था की जांच

सीएक्यूएम ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में बताया कि जले हुए क्षेत्र का आकलन करने वाली यह व्यवस्था अभी पूरी तरह जांची नहीं गई है. इसमें आगे सुधार की गुंजाइश है. आयोग का कहना है कि व्यवस्था को बेहतर बनाने के बाद पराली जलाने की निगरानी और उस पर कार्रवाई ज्यादा प्रभावी हो सकती है. जमीन पर जाकर जांच और सैटेलाइट से मिले आंकड़ों को मिलाने से यह समझने में भी मदद मिलेगी कि खेतों में लगी आग से कितना धुआं और प्रदूषण फैल रहा है.

Topics: