सामान्य से कम होती है बारिश तो खेती हो जाएगी मंहगी, किसानों को डीजल, बिजली पर मिलेगी सब्सिडी ?
लखविंदर सिंह औलख ने किसान इंडिया से बात करते हुए कहा कि अगर सामन्य से कम बारिश होती है, तो खेती की लागत बढ़ जाएगी. क्योंकि अधिकांश किसान मजबूरी में ट्यूबवेल से सिंचाई करेंगे. इससे इनपुट लागत बढ़ जाएगी. उन्होंने कहा कि खरीफ सीजन में सबसे अधिक पानी की रूरत होती है.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग(IMD) ने 2026 में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से कम यानी ‘बिलो नॉर्मल’ रहने की संभावना जताई है. अनुमान है कि कुल बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का लगभग 92 फीसदी रहेगी. अगर ऐसा होता है, तो 2023 के बाद पहली बार देश में मॉनसून सामान्य से कम रहेगा. IMD ने कहा है कि इस अनुमान में ±5 फीसदी की त्रुटि हो सकती है और इसकी मुख्य वजह अल नीनो का बनना है, जो जून से सितंबर के दौरान असर डाल सकता है. इसके चलते देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है. ऐसे में खीत में इनपुट लगात बढ़ सकती है. वहीं, IMD की इस भविष्यवाणी से किसानों की चिंता बढ़ गई है. भारतीय किसान एकता (बीकेई) के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख ने राज्य सरकार से IMD की भविष्यवाणी को देखने हुए पहले से ही पानी प्रबंधन करने की सलाह दी है. उन्होंने किसान इंडिया से बात करते हुए कहा है कि यदि औसत से कम बारिश होती है, तो किसानों को डीजल पर सब्सिडी मिलनी चाहिए, ताकि इनपुट लागत को कम किया जा सके.
क्या बोले किसान नेता लखविंदर सिंह औलख
वहीं, लखविंदर सिंह औलख ने किसान इंडिया से बात करते हुए कहा कि अगर सामन्य से कम बारिश होती है, तो खेती की लागत बढ़ जाएगी. क्योंकि अधिकांश किसान मजबूरी में ट्यूबवेल से सिंचाई करेंगे. इससे इनपुट लागत बढ़ जाएगी. उन्होंने कहा कि खरीफ सीजन में सबसे अधिक पानी की रूरत होती है. खास कर धान की खेती के लिए पानी बहुत जरूरी है. तीन महीने तक खेतों में पानी रखना पड़ता है. ईरान- इजरायल युद्ध से डीजल में बढ़ोतरी का भी अनुमान है. अगर डीजल आने वाले समय में महंगा होता है, तो सीमांत किसानों के लिए बारिश के अभाव में धान की खेती करना मुश्किल हो जाएगा. उन्होंने कहा कि IMD की भविष्यवाणी को देखते हुए राज्य सरकारों को किसानों को डीजल और बिजली पर सब्सिडी देनी चाहिए. ताकि किसान अपनी फसल की समय पर चिंचाई कर सकें.
Lakhwinder Singh Aulakh
उन्होंने कहा कि सभी राज्य सरकारों को अभी से ही पानी प्रबंधन की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. खरीफ सीजन के दौरान नहरों में बराबर छोड़ा जाना चाहिए, ताकि सिंचाई में कोई दिक्कत न हो. उन्होंने कहा कि पानी की किल्लत को दूर करने के लिए अगर जरूरत पड़े तो उद्योग को मिलने वाले पानी में कटौती की जानी चाहिए, ताकि नहरों में पानी का बहाव हमेशा बना रहे.
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मॉनसून का असर अर्थव्यवस्था को करेगा कमजोर
कृषि एक्सपर्ट निर्मल यादव का कहना है कि कमजोर मॉनसून का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर कई तरीकों से पड़ता है. जब बारिश कम होती है तो फसल उत्पादन घटता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं और किसानों की आमदनी कम हो जाती है. इसका सीधा असर खर्च पर पड़ता है, खासकर FMCG उत्पादों, ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की खरीद पर. उन्होंने कहा कि यह समय और भी संवेदनशील है, क्योंकि हाल ही में ग्रामीण इलाकों में खपत धीरे-धीरे सुधरनी शुरू हुई थी. कई रिपोर्टों के मुताबिक, गांवों में शहरों के मुकाबले बेहतर ग्रोथ देखने को मिल रही है, लेकिन कमजोर मॉनसून इस सुधार को फिर से प्रभावित कर सकता है.
खाद की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, यह पिछले 25 सालों में सबसे कमजोर मॉनसून का शुरुआती अनुमान है, जिससे महंगाई, आर्थिक विकास और ग्रामीण मांग पर असर पड़ सकता है. यह स्थिति ऐसे समय में आई है जब ईरान- इजरायल युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन पहले से दबाव में हैं. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि खेती में इस्तेमाल होने वाली चीजों की कीमतें अब बढ़ने लगी हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद के दाम तेजी से बढ़े हैं और हाल ही में यह 37 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं. इसके साथ ही डीजल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं. इन दोनों वजहों से आने वाले समय में खाद्य महंगाई और ज्यादा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बारिश कम होने से खेती पर इनपुट लागत बढ़ जाएगी, जिसका सीधा असर खाद्य महंगाई पर पड़ेगा.