खुरपका-मुंहपका का कहर! 24 घंटे में मौत तक का खतरा, बरसात में पशुपालक रहें अलर्ट
Dairy Farming Tips: बरसात का मौसम जहां खेती-किसानी के लिए राहत लेकर आता है, वहीं पशुपालकों के लिए कई नई चुनौतियां भी खड़ी कर देता है. इस समय नमी, कीचड़ और बदलते वातावरण के कारण पशुओं में बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है. थोड़ी सी लापरवाही भी पशुधन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. ऐसे में सही देखभाल और सतर्कता ही पशुओं को स्वस्थ रखने की सबसे बड़ी कुंजी बन जाती है.
मानसून के दौरान खेतों और चरागाहों में कई तरह की नई घास उग आती है. इनमें से कुछ घास पशुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक या जहरीली हो सकती हैं, इसलिए पशुपालकों को चराई पर खास ध्यान रखना चाहिए.
बारिश के मौसम में जगह-जगह कीचड़ और गंदा पानी जमा हो जाता है. ऐसे माहौल में बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं, खासकर खराब चारे के साथ मिलकर ये पशुओं में गंभीर संक्रमण पैदा कर सकते हैं.
इस मौसम में गलघोंटू रोग सबसे गंभीर माना जाता है. इसमें पशु को अचानक तेज बुखार, मुंह से लगातार लार आना, खाने-पीने में दिक्कत और सांस लेने में परेशानी होती है. समय पर इलाज न मिलने पर 24 घंटे के भीतर पशु की जान भी जा सकती है. इससे बचने के लिए समय पर टीकाकरण कराना जरूरी है
बरसात में गायों में लंगड़ा बुखार का खतरा बढ़ जाता है. इसमें पशु को तेज बुखार आता है और शरीर के कुछ हिस्सों में सूजन दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे बढ़कर कमजोरी का कारण बनती है. संक्रमित पशु को तुरंत अलग रखना जरूरी होता है.
खुरपका-मुंहपका बीमारी पशु के मुंह और खुरों में छाले पैदा कर देती है, जिससे उसे खाने-पीने में परेशानी होती है. इसका सीधा असर दूध उत्पादन पर पड़ता है और पशु कमजोर होने लगता है. इस बीमारी से बचने के लिए नियमित टीकाकरण कराना जरूरी है.
बरसात शुरू होने से पहले पशुओं का टीकाकरण कराना बेहद जरूरी है. गौशाला को सूखा और साफ रखना और बारिश का पानी जमा न होने देना पशुओं को बीमारियों से बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है. साथ ही पशुओं को स्वच्छ व पौष्टिक चारा-पानी दें.