समुद्र उबल रहा है! अल नीनो दिखाने लगा अपना असर… वैज्ञानिकों ने दी बड़ी चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्रों में समुद्री हीटवेव तेजी से बढ़ रही हैं. खासकर प्रशांत महासागर के मध्य हिस्से से लेकर अमेरिका और मेक्सिको के पश्चिमी तट तक समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. इन क्षेत्रों में समुद्र का अत्यधिक गर्म होना समुद्री जीवों, मछलियों और मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है.
Global ocean heat: दुनियाभर में मौसम लगातार बदल रहा है और अब इसका असर समुद्रों पर भी साफ दिखाई देने लगा है. वैज्ञानिकों की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के महासागर रिकॉर्ड स्तर की गर्मी के करीब पहुंच गए हैं. अप्रैल 2026 में समुद्र की सतह का तापमान इतिहास के सबसे ज्यादा तापमान वाले वर्षों के करीब दर्ज किया गया. विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में अल नीनो की स्थिति बनने से मौसम और ज्यादा अस्थिर हो सकता है.
यूरोपीय जलवायु एजेंसी कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (ECMWF) की रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल 2026 दुनिया का तीसरा सबसे गर्म अप्रैल रहा. समुद्रों में बढ़ती गर्मी, समुद्री हीटवेव, बाढ़, सूखा और तेज तूफानों जैसी घटनाएं अब लगातार बढ़ रही हैं.
समुद्रों का तापमान तेजी से बढ़ रहा
रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 में ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर बाकी महासागरों का समुद्री सतह तापमान रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुंच गया. वैज्ञानिकों ने बताया कि समुद्र की सतह का औसत तापमान 21 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो अप्रैल महीने के लिए अब तक का दूसरा सबसे ज्यादा तापमान माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्रों में लगातार बढ़ती गर्मी समुद्री जीवन, मौसम और पर्यावरण के लिए खतरे का संकेत है.
अल नीनो बनने के संकेत
वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर में धीरे-धीरे अल नीनो की स्थिति विकसित हो रही है. आने वाले महीनों में इसका असर और स्पष्ट दिखाई दे सकता है. दरअसल, अल नीनो एक ऐसी मौसमीय स्थिति होती है जिसमें समुद्र की सतह सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाती है. इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है.
भारत समेत कई देशों में अल नीनो के दौरान सामान्य से कम बारिश, ज्यादा गर्मी और सूखे जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं.
अप्रैल 2026 रहा दुनिया का तीसरा सबसे गर्म अप्रैल
कॉपरनिकस की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक का तीसरा सबसे गर्म अप्रैल रहा. इस दौरान दुनिया का औसत तापमान सामान्य से 0.52 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रिकॉर्ड किया गया. पृथ्वी का औसत सतही तापमान 14.89 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. इससे पहले अप्रैल 2024 सबसे गर्म अप्रैल और अप्रैल 2025 दूसरा सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया गया था.
समुद्री हीटवेव ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्रों में समुद्री हीटवेव तेजी से बढ़ रही हैं. खासकर प्रशांत महासागर के मध्य हिस्से से लेकर अमेरिका और मेक्सिको के पश्चिमी तट तक समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. इन क्षेत्रों में समुद्र का अत्यधिक गर्म होना समुद्री जीवों, मछलियों और मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में चक्रवात और तेज तूफानों की घटनाएं बढ़ सकती हैं.
कई देशों में दिखा चरम मौसम का असर
अप्रैल महीने में दुनिया के कई हिस्सों में चरम मौसम की घटनाएं देखने को मिलीं. पश्चिम एशिया और दक्षिण-मध्य एशिया के कई देशों में अचानक आई बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया. ईरान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब और सीरिया के कई हिस्सों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गईं. वहीं दक्षिणी अफ्रीका के कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बनी रही.
आर्कटिक में बर्फ लगातार घट रही
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ का स्तर अप्रैल महीने में दूसरा सबसे कम रहा. साल की शुरुआत से ही आर्कटिक में बर्फ सामान्य से काफी कम बनी हुई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ने का खतरा भी बढ़ रहा है.
यूरोप में दिखा मौसम का बड़ा अंतर
अप्रैल के दौरान यूरोप के कई हिस्सों में मौसम पूरी तरह अलग-अलग दिखाई दिया. स्पेन समेत दक्षिण-पश्चिमी यूरोप में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहा और स्पेन में अब तक का सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया गया. वहीं पूर्वी यूरोप के कई हिस्सों में मौसम अपेाकृत ठंडा रहा.
मौसम क्यों हो रहा इतना अस्थिर?
विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग इसकी सबसे बड़ी वजह हैं. कार्बन उत्सर्जन बढ़ने से पृथ्वी और समुद्र दोनों का तापमान लगातार बढ़ रहा है. इसका असर बारिश, बर्फबारी, तूफान और समुद्री तापमान पर साफ दिखाई दे रहा है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में अगर तापमान बढ़ने की रफ्तार नहीं रुकी, तो चरम मौसम की घटनाएं और तेजी से बढ़ सकती हैं.
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
अल नीनो और समुद्रों की बढ़ती गर्मी का असर भारत पर भी पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मानसून कमजोर हो सकता है और कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज हो सकती है. वहीं कुछ क्षेत्रों में तेज गर्मी और हीटवेव की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं. खेती और जल संसाधनों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि दुनिया लगातार गर्म होती जा रही है और अब मौसम के बदलाव ज्यादा खतरनाक रूप लेने लगे हैं. समुद्रों की बढ़ती गर्मी सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कृषि और मानव जीवन के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए गंभीर कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है.