कमर्शियल गैस के बाद लग सकता है महंगाई का डबल झटका, अब ये चीजें हो सकती हैं महंगी
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के अंदर पड़ता है. ऐसे में सरकार के सामने अब बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. एक तरफ उसे आम लोगों को महंगाई से बचाना है, वहीं दूसरी तरफ तेल कंपनियों को भारी नुकसान से भी बचाना है.
India fuel price hike: देश में फिलहाल पेट्रोल, डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतें स्थिर हैं, जिससे आम लोगों को राहत जरूर मिली है. लेकिन इसके पीछे एक बड़ी आर्थिक सच्चाई छिपी है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे तेल कंपनियों पर भारी दबाव बनता जा रहा है. ऐसे में आने वाले समय में इन जरूरी ईंधनों की कीमत बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
हाल ही में कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में करीब 993 रुपये की बड़ी बढ़ोतरी हुई है. इसके बावजूद घरेलू LPG, पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं. पहली नजर में यह राहत भरी खबर लगती है, लेकिन असल में सरकार अभी कीमतों को रोककर दबाव संभाल रही है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के अंदर पड़ता है. इस समय कच्चे तेल की कीमत 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है. कुछ दिनों पहले यह 126 डॉलर तक भी पहुंच गई थी और अब भी 110 डॉलर से ऊपर बनी हुई है. जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो पेट्रोल और डीजल बनाने की लागत भी बढ़ जाती है. लेकिन अगर घरेलू बाजार में कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं, तो यह अंतर तेल कंपनियों को नुकसान के रूप में झेलना पड़ता है.
तेल कंपनियों का बढ़ता नुकसान
रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार मौजूदा हालात में तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है. इसे मार्केटिंग मार्जिन के रूप में देखा जाता है, जो इस समय निगेटिव हो चुका है. इसका मतलब है कि कंपनियां जितना खर्च कर रही हैं, उतना वसूल नहीं कर पा रही हैं.
घरेलू LPG के मामले में भी स्थिति गंभीर होती जा रही है. अनुमान है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो वित्त वर्ष 2026-27 में LPG पर अंडर-रिकवरी 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है.
सरकार के लिए बढ़ती चुनौती
सरकार के सामने अब बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. एक तरफ उसे आम लोगों को महंगाई से बचाना है, वहीं दूसरी तरफ तेल कंपनियों को भारी नुकसान से भी बचाना है.
2026-27 के बजट में LPG सब्सिडी के लिए 11,085 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसमें से 9,200 करोड़ रुपये गरीब परिवारों के लिए और 1,500 करोड़ रुपये डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के लिए रखे गए हैं. लेकिन अगर LPG पर अंडर-रिकवरी 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, तो यह बजट से कई गुना ज्यादा बोझ होगा.
पहले भी मिल चुकी है राहत
यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने तेल कंपनियों को राहत दी हो. अगस्त 2025 में सरकार ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को घरेलू एलपीजी पर हुए नुकसान की भरपाई के लिए 30,000 करोड़ रुपये की सहायता दी थी. इससे साफ है कि सरकार पहले भी कंपनियों का घाटा कम करने के लिए कदम उठाती रही है.
महंगी ऊर्जा का व्यापक असर
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का असर केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता. इसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. इक्रा के अनुसार 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी भी बढ़कर 2.05 से 2.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि बजट में इसके लिए केवल 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसका मतलब है कि महंगी ऊर्जा का असर सरकार के खर्च, कंपनियों के मुनाफे और आम जनता की जेब तीनों पर पड़ रहा है.
क्या कर सकती है सरकार
सरकार के सामने अब तीन रास्ते हैं. पहला यह कि तेल कंपनियों को नुकसान उठाने दिया जाए, लेकिन इससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है. दूसरा रास्ता यह है कि सरकार बजट से फिर कंपनियों को आर्थिक मदद दे, लेकिन इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा. वहीं तीसरा विकल्प यह है कि धीरे-धीरे पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की जाए, जिससे आम लोगों पर महंगाई का असर पड़ेगा.
मौजूदा कीमतें और स्थिति
दिल्ली में फिलहाल पेट्रोल की कीमत करीब 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 87.67 रुपये प्रति लीटर है. ये कीमतें अप्रैल 2022 से लगभग स्थिर बनी हुई हैं. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह स्थिरता ज्यादा समय तक बनी रहेगी, ऐसा कहना मुश्किल है.