शहद निर्यात पर सरकार का बड़ा फैसला: MEP की समय सीमा दिसंबर 2026 तक बढ़ी, किसानों को मिलेगी राहत
सरकार शहद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए “नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन” (NBHM) चला रही है. यह ‘स्वीट रिवोल्यूशन’ का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य मधुमक्खी पालन को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा देना है. इस योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण, उपकरण और तकनीकी सहायता दी जाती है, ताकि वे बेहतर गुणवत्ता का शहद उत्पादन कर सकें और अपनी आय बढ़ा सकें.
Honey export policy 2026: भारत में शहद उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है. प्राकृतिक शहद के निर्यात पर लागू न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) को 1400 डॉलर प्रति टन पर ही बनाए रखते हुए इसकी समय सीमा अब 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दी गई है. इस फैसले से शहद निर्यातकों और मधुमक्खी पालन से जुड़े किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है.
क्या है MEP और क्यों जरूरी है
MEP यानी न्यूनतम निर्यात मूल्य वह सीमा होती है, जिसके नीचे कोई भी उत्पाद विदेशों में निर्यात नहीं किया जा सकता. सरकार इसका इस्तेमाल बाजार को संतुलित रखने और निर्यात को नियंत्रित करने के लिए करती है.
शहद के मामले में पहले यह सीमा 2000 डॉलर प्रति टन थी, जिसे अगस्त 2025 में घटाकर 1400 डॉलर कर दिया गया था. इस फैसले का मकसद भारतीय शहद को वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाना था.
अब क्यों बढ़ाई गई समय सीमा
विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के ताजा नोटिफिकेशन के अनुसार, 1400 डॉलर प्रति टन का MEP अब 31 दिसंबर 2026 तक लागू रहेगा. इससे पहले सरकार ने जनवरी में इसकी समय सीमा मार्च 2026 तक बढ़ाई थी. सरकार का मानना है कि कम MEP से भारतीय शहद की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बनी रहेगी और निर्यात में तेजी आएगी.
निर्यात के आंकड़े क्या कहते हैं
अगर हाल के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत का शहद निर्यात मजबूत स्थिति में है, लेकिन थोड़ी गिरावट भी देखने को मिली है. वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से जनवरी के बीच भारत ने 95,308 टन शहद का निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब 176.56 मिलियन डॉलर रही. इसके मुकाबले पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 1 लाख टन से ज्यादा शहद निर्यात किया था, जिसकी कुल कीमत 206.47 मिलियन डॉलर थी. इससे यह साफ होता है कि निर्यात में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और कीमतों का असर भी पड़ा है.
किन देशों में जाता है भारतीय शहद
भारत दुनिया के बड़े शहद उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है. भारतीय शहद की सबसे ज्यादा मांग अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब और कतर जैसे देशों में है. इन बाजारों में भारतीय शहद अपनी गुणवत्ता और विविधता के कारण पसंद किया जाता है.
शहद की किस्मों की खासियत
भारत में कई तरह के प्राकृतिक शहद का उत्पादन होता है. इनमें सरसों, यूकेलिप्टस, लीची और सूरजमुखी शहद प्रमुख हैं. हर किस्म का स्वाद और गुण अलग होता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय शहद की पहचान मजबूत बनी रहती है.
किन राज्यों में होता है ज्यादा उत्पादन
भारत में शहद उत्पादन कुछ खास राज्यों में ज्यादा होता है. उत्तर प्रदेश इसमें सबसे आगे है और देश के कुल उत्पादन का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा देता है. इसके बाद पश्चिम बंगाल (16 प्रतिशत), पंजाब (14 प्रतिशत), बिहार (12 प्रतिशत) और राजस्थान (9 प्रतिशत) का स्थान आता है. इन राज्यों में मधुमक्खी पालन किसानों के लिए एक अच्छा आय का स्रोत बनता जा रहा है.
सरकार की ‘स्वीट रिवोल्यूशन’ पहल
सरकार शहद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए “नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन” (NBHM) चला रही है. यह ‘स्वीट रिवोल्यूशन’ का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य मधुमक्खी पालन को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा देना है.
इस योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण, उपकरण और तकनीकी सहायता दी जाती है, ताकि वे बेहतर गुणवत्ता का शहद उत्पादन कर सकें और अपनी आय बढ़ा सकें. इस मिशन के लिए पहले तीन साल के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, जिसे आगे बढ़ाते हुए 2025-26 तक जारी रखा गया है.
किसानों और निर्यातकों के लिए क्या मायने
MEP की समय सीमा बढ़ने से शहद निर्यातकों को स्थिरता मिलेगी और वे लंबे समय की योजना बना सकेंगे. किसानों को भी इसका फायदा मिलेगा, क्योंकि निर्यात बढ़ने से उनकी उपज की मांग बढ़ेगी और उन्हें बेहतर कीमत मिल सकेगी. इसके साथ ही मधुमक्खी पालन को एक मजबूत व्यवसाय के रूप में विकसित करने में भी मदद मिलेगी.