Punjab agriculture plan 2026: पंजाब में हर साल धान की कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या देशभर में चर्चा का विषय बन जाती है. इससे न केवल राज्य बल्कि आसपास के इलाकों, खासकर दिल्ली-NCR में भी वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है. लेकिन इस बार पंजाब सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए एक बड़ा और ठोस कदम उठाया है. वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने 1,388 करोड़ रुपये का कृषि एक्शन प्लान तैयार किया है, जिसमें सबसे ज्यादा ध्यान पराली प्रबंधन पर दिया गया है.
पराली पर फोकस: बजट का बड़ा हिस्सा
इस नए कृषि प्लान की सबसे खास बात यह है कि कुल बजट का लगभग 600 करोड़ रुपये केवल पराली प्रबंधन के लिए निर्धारित किए गए हैं. यानी करीब 43 प्रतिशत बजट इसी एक समस्या को हल करने पर खर्च होगा. यह दिखाता है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है.
सरकार का मानना है कि अगर किसानों को सही विकल्प और सुविधाएं मिलेंगी, तो वे खुद ही पराली जलाने से बचेंगे. इस दिशा में दो तरह के उपायों पर काम किया जा रहा है खेत के अंदर और खेत के बाहर समाधान.
खेत में ही समाधान
पहला तरीका है कि पराली को खेत में ही खत्म किया जाए. इसके लिए किसानों को सुपर सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी मशीनों पर भारी सब्सिडी दी जा रही है. ये मशीनें पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिला देती हैं.
इससे दो फायदे होते हैं एक तो पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती और दूसरा, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. किसानों को अगली फसल के लिए कम खाद डालनी पड़ती है, जिससे लागत भी घटती है.
खेत से बाहर समाधान
दूसरा तरीका है पराली को खेत से बाहर निकालकर उसका उपयोग करना. इसके लिए बेलर मशीनों की संख्या बढ़ाई जा रही है, जो पराली की गांठें बनाती हैं. इन गांठों को बायोगैस प्लांट या बिजली उत्पादन इकाइयों को बेचा जा सकता है. इससे किसानों को एक अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा और पराली जलाने की मजबूरी खत्म होगी.
आंकड़े दे रहे हैं उम्मीद
पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि सरकार के प्रयासों का असर दिखने लगा है. 2024 में जहां 10,909 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई. यानी करीब 53 प्रतिशत की कमी आई है. इस साल सरकार का लक्ष्य इस आंकड़े को और नीचे लाना है, खासकर उन जिलों में जहां यह समस्या ज्यादा है, जैसे संगरूर, बठिंडा और फिरोजपुर.
छोटे किसानों के लिए बड़ी राहत
सरकार ने यह भी समझा है कि हर किसान महंगी मशीनें नहीं खरीद सकता. इसलिए गांव-गांव में कस्टम हायरिंग सेंटर बनाए जा रहे हैं, जहां से किसान किराए पर मशीनें ले सकेंगे. इन केंद्रों को मशीनें खरीदने के लिए 80 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है. इसके अलावा 95 करोड़ रुपये कृषि मशीनीकरण के लिए अलग से रखे गए हैं.
पानी बचाने की दिशा में कदम
पंजाब में गिरते भूजल स्तर की समस्या भी गंभीर है. इसे देखते हुए 33.33 करोड़ रुपये ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के लिए रखे गए हैं. इसके तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जाएगा. साथ ही धान की सीधी बुवाई (DSR तकनीक) को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत संभव है.
फसल विविधीकरण की ओर बढ़ता पंजाब
राज्य को गेहूं-धान के चक्र से बाहर निकालने के लिए 50 करोड़ रुपये से ज्यादा फसल विविधीकरण पर खर्च किए जाएंगे. किसानों को मक्का, दालें और कपास जैसी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है. इससे पानी की खपत कम होगी और किसानों की आमदनी भी बढ़ सकती है.
प्राकृतिक खेती पर जोर
मिट्टी की बिगड़ती सेहत को सुधारने के लिए सरकार ने प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देने का फैसला किया है. इसके लिए 8.25 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को फायदा होगा.
क्या बदलेगा इस योजना से?
यह पूरा कृषि प्लान सिर्फ एक बजट नहीं, बल्कि पंजाब की खेती को नई दिशा देने की कोशिश है. अगर मशीनें समय पर किसानों तक पहुंचती हैं और योजनाएं सही तरीके से लागू होती हैं, तो इस साल पराली जलाने की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है.
सबसे बड़ी बात यह है कि अब सरकार किसानों को सजा देने के बजाय समाधान देने पर ध्यान दे रही है. अगर यह मॉडल सफल होता है, तो पंजाब पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है जहां खेती भी होगी और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा.