पंजाब तक पहुंचा ईरान- इजरायल जंग का असर, शहद कारोबार प्रभावित.. कीमतों में 28 फीसदी गिरावट

मधुमक्खी पालकों का कहना है कि शहद को स्टोर करने में करीब 2 रुपये प्रति किलो सालाना खर्च आता है, लेकिन मौजूदा कीमतों पर बेचने से नुकसान हो रहा है, इसलिए उनके पास स्टॉक रोकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. ऐसे में कहा जा रहा है कि  कीमतों में गिरावट आने से करीब 25-30 प्रतिशत पालक इस काम को छोड़ चुके हैं.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 1 Apr, 2026 | 12:05 PM

Honey Price Fall: ईरान- इजरायल जंग के चलते शहद की कीमतों में तेज गिरावट से मधुमक्खी पालक संकट में आ गए हैं. निर्यात के रास्ते नहीं होने के चलते किसान शहद बेचने की बजाय स्टोर करने को मजबूर हैं. खास बात यह है देश के तीसरे सबसे बड़े शहद उत्पादक राज्य पंजाब में कीमतों में कुछ ज्यादा ही गिरावट आई है. किसानों के मुताबिक, सरसों शहद का भाव अब करीब 85 रुपये प्रति किलो रह गया है, जो पिछले साल इसी समय 118 रुपये और 2024 में करीब 148 रुपये था. यानी पिछले साल के मुकाबले कीमतों में 28 फीसदी की कमी आई है. ऐसे में किसानों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो गया है.

मधुमक्खी पालकों का कहना है कि अमेरिका में आयात शुल्क बढ़ने से भारतीय शहद की प्रतिस्पर्धा कम हो गई है. साथ ही यूरोप और अमेरिका में मांग पहले से ही कमजोर थी और अब मध्य पूर्व में तनाव के कारण निर्यात और प्रभावित हुआ है. ऐसे में बाजार में मांग घट गई है. किसान अब शहद को 15-30 डिग्री तापमान पर कोल्ड स्टोरेज या एसी में रखकर बेहतर कीमत का इंतजार कर रहे हैं.

व्यापारी केवल 30 प्रतिशत पैसा देकर शहद खरीद रहे हैं

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, मधुमक्खी पालकों  का कहना है कि शहद को स्टोर करने में करीब 2 रुपये प्रति किलो सालाना खर्च आता है, लेकिन मौजूदा कीमतों पर बेचने से नुकसान हो रहा है, इसलिए उनके पास स्टॉक रोकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. ऐसे में कहा जा रहा है कि  कीमतों में गिरावट आने से करीब 25-30 प्रतिशत पालक इस काम को छोड़ चुके हैं. राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब में व्यापारी केवल 30 प्रतिशत पैसा देकर शहद खरीद रहे हैं और बाकी भुगतान 3-4 महीने बाद करने का समझौता कर रहे हैं.

कितनी है शहद उत्पादन लागत

किसान सरसों, सफेदा, ताहली, बेर और लीची जैसे फूलों से शहद तैयार करते हैं. एक किसान ने कहा कि सरसों शहद  की लागत करीब 70 रुपये प्रति किलो आती है, जबकि बाजार में 80-85 रुपये मिल रहे हैं, जिससे मुनाफा नहीं हो रहा. पिछले साल का शहद भी अभी तक नहीं बिका है और कोल्ड स्टोरेज में पड़ा है. पहले अमेरिका के टैरिफ बढ़ने से मांग घटी और अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव से निर्यात और प्रभावित हो गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत खुद एक बड़ा बाजार है, लेकिन जागरूकता की कमी और सरसों के शहद को लेकर गलत धारणाओं के कारण इसकी खपत प्रभावित हो रही है. सरसों का शहद, जो कुल उत्पादन का करीब 80 प्रतिशत है, प्राकृतिक रूप से जमकर क्रीमी हो जाता है, लेकिन कई लोग इसे मिलावट समझ लेते हैं, जबकि यह गलत है. वहीं, अमेरिका में इसी शहद की काफी मांग है और इसे स्प्रेड के रूप में खाया जाता है.

पंजाब में करीब 5,000 हैं मधुमक्खी पालक

अभी पंजाब में करीब 5,000 से 5,500 मधुमक्खी पालक हैं, जो लगभग 6 लाख बॉक्स संभालते हैं. सरकार की नेशनल बीकीपिंग मिशन जैसी योजनाओं के तहत सब्सिडी और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिलती है, लेकिन मौजूदा बाजार गिरावट से इनका फायदा कम हो गया है. पंजाब में मधुमक्खी पालन ज्यादातर घुमंतू तरीके से होता है, जहां पालक फूलों के मौसम के अनुसार राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में अपने बॉक्स ले जाते हैं.

मधुमक्खी पालकों ने की सरकार से ये मांग

शहद की गिरती कीमतों, बढ़ते स्टोरेज खर्च और निर्यात बाजार की अनिश्चितता के कारण मधुमक्खी पालकों  ने सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने हरियाणा की ‘भावांतर भरपाई योजना’ जैसी व्यवस्था लागू करने की मांग की है, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके और लोग इस काम को छोड़ने से बचें. राज्य बागवानी विभाग के संयुक्त निदेशक हरमेल सिंह ने भी माना कि निर्यात में दिक्कतों के कारण शहद की कीमतें घटी हैं और पालक अपना स्टॉक जमा कर रहे हैं.. वहीं, लुधियाना के एक निर्यातक ने कहा कि अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है और हालात तभी साफ होंगे जब निर्यात दोबारा शुरू होगा.

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Published: 1 Apr, 2026 | 11:52 AM
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