सोयाबीन बाजार में सुस्ती, निर्यात घटकर 50 हजार टन पर सिमटा… आखिर क्यों घट रही है मांग

इस साल अप्रैल में भारत का सोयाबीन खली निर्यात घटकर केवल 50 हजार टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह आंकड़ा 2 लाख 14 हजार टन था. यानी एक साल के भीतर निर्यात में बहुत बड़ी कमी दर्ज हुई है. सिर्फ निर्यात ही नहीं, बल्कि उत्पादन और मंडियों में आवक पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है.

नई दिल्ली | Published: 16 May, 2026 | 08:24 AM

Soybean meal exports: भारत में सोयाबीन खली के निर्यात में इस साल अप्रैल महीने के दौरान भारी गिरावट दर्ज की गई है. सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने किसानों, कारोबारियों और उद्योग से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है. आंकड़ों के मुताबिक इस साल अप्रैल में भारत का सोयाबीन खली निर्यात घटकर केवल 50 हजार टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह आंकड़ा 2 लाख 14 हजार टन था. यानी एक साल के भीतर निर्यात में बहुत बड़ी कमी दर्ज हुई है.

सिर्फ निर्यात ही नहीं, बल्कि उत्पादन और मंडियों में आवक पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सस्ते विकल्पों के कारण भारतीय सोयाबीन खली की मांग प्रभावित हुई है.

उत्पादन में भी आई बड़ी गिरावट

सोयाबीन खली के उत्पादन में भी इस साल कमी देखी गई है. पिछले साल अप्रैल में जहां उत्पादन 7 लाख 50 हजार टन था, वहीं इस बार यह घटकर 6 लाख 31 हजार टन रह गया है.

कृषि बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि उत्पादन घटने की एक बड़ी वजह सोयाबीन की कम आवक और पेराई में कमी है. कई इलाकों में किसानों ने कम दाम मिलने की आशंका के चलते फसल रोककर रखी, जिससे बाजार में पर्याप्त मात्रा नहीं पहुंच पाई. उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि आने वाले महीनों में अगर वैश्विक मांग नहीं बढ़ी तो इसका असर किसानों की आय और तेल उद्योग दोनों पर पड़ सकता है.

सात महीनों में भी कमजोर रहा कारोबार

अक्टूबर से अप्रैल तक के सात महीनों के आंकड़े भी निराशाजनक रहे हैं. इस अवधि में कुल सोयाबीन खली उत्पादन 5.13 मिलियन टन दर्ज किया गया, जबकि पिछले साल इसी दौरान यह 5.52 मिलियन टन था. निर्यात के मामले में भी गिरावट जारी रही. चालू तेल वर्ष के अक्टूबर-अप्रैल अवधि में सोयाबीन खली का निर्यात घटकर 8 लाख 22 हजार टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 13 लाख 30 हजार टन था. इन आंकड़ों से साफ है कि भारतीय सोयाबीन खली को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कड़ी चुनौती मिल रही है.

मंडियों में कम पहुंच रही सोयाबीन

इस साल मंडियों में सोयाबीन की आवक भी कम रही है. अप्रैल महीने में करीब 4 लाख 50 हजार टन सोयाबीन बाजारों में पहुंची, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 5 लाख 50 हजार टन था. अगर पूरे अक्टूबर से अप्रैल की अवधि की बात करें तो कुल आवक 6.75 मिलियन टन रही, जो पिछले साल 7.75 मिलियन टन थी. कम आवक का असर सीधे पेराई उद्योग पर पड़ा है.

अप्रैल में सोयाबीन की पेराई घटकर 8 लाख टन रह गई, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह 9 लाख 50 हजार टन थी. हालांकि अप्रैल महीने में सोयाबीन का कुल स्टॉक 4.38 मिलियन टन दर्ज किया गया है, जिससे आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति कुछ हद तक संतुलित रह सकती है.

अगले साल उत्पादन और घटने की आशंका

एसोसिएशन ने तेल वर्ष 2025-26 के लिए भी अनुमान जारी किए हैं. इसके अनुसार अगले तेल वर्ष में भारत का कुल सोयाबीन उत्पादन 11 मिलियन टन रहने की संभावना है, जबकि पिछले वर्ष यह 12.9 मिलियन टन था. यानी आने वाले समय में उत्पादन में और गिरावट देखने को मिल सकती है. हालांकि एसोसिएशन ने अगले वर्ष के लिए सोयाबीन खली निर्यात लक्ष्य 1 मिलियन टन पर बरकरार रखा है.

इसके साथ ही अगले साल सोयाबीन की कुल पेराई 10.2 मिलियन टन रहने का अनुमान जताया गया है. घरेलू बाजार में पशु और पोल्ट्री आहार के लिए सोयाबीन खली की खपत 6.2 मिलियन टन तक पहुंच सकती है.

आखिर क्यों घट रही है मांग

सोयाबीन की पेराई से तेल और सोयाबीन खली तैयार होती है. सोयाबीन खली का सबसे ज्यादा उपयोग पशु चारे में किया जाता है. भारतीय सोयाबीन खली को दुनिया के कई देशों में पसंद किया जाता है क्योंकि यह बिना जेनेटिक बदलाव वाली और प्रोटीन से भरपूर मानी जाती है. इसके बावजूद इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है. खासतौर पर सस्ते विकल्पों की उपलब्धता ने भारतीय निर्यात को प्रभावित किया है.

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बाजार में डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स जैसे सस्ते उत्पाद तेजी से जगह बना रहे हैं. यही वजह है कि विदेशी खरीदार अब कम कीमत वाले विकल्पों की ओर झुक रहे हैं.

भारत दुनिया के बड़े सोया तेल आयातकों में शामिल है और सोयाबीन खली का प्रमुख निर्यातक भी माना जाता है. ऐसे में निर्यात में आई यह गिरावट कृषि और खाद्य उद्योग दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है.

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