Explainer: बजट 2026 में अचानक क्यों अहम हो गई है भारत की खेती?

बजट 2026 में सरकार की कोशिश यह दिख रही है कि खेती को केवल राहत पैकेज और सब्सिडी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे एक मजबूत आर्थिक इंजन के रूप में विकसित किया जाए. सरकार समझती है कि जब तक खेती में निवेश नहीं बढ़ेगा, तब तक किसानों की आय, निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थायी सुधार संभव नहीं है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 9 Jan, 2026 | 11:55 AM

Budget 2026: भारत की खेती को अक्सर एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जिसमें ताकत भी है और चुनौतियां भी. यही खेती देश की करीब आधी आबादी को रोजगार देती है, 140 करोड़ लोगों के लिए भोजन का इंतजाम करती है और भारत को अनाज, फल-सब्जी, दूध, मसाले और समुद्री उत्पादों का बड़ा उत्पादक बनाती है. लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि किसानों की आय कम है, लागत बढ़ती जा रही है और नीतियों को लेकर असमंजस बना रहता है.

अब बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने खेती को एक नए नजरिए से देखने की जरूरत पैदा कर दी है. इसी वजह से बजट 2026 में भारतीय खेती पर खास ध्यान दिया जा रहा है.

बदलती दुनिया में खेती अचानक अहम क्यों हो गई?

आज दुनिया का व्यापार तेजी से बदल रहा है. कई देशों के बीच टैरिफ बढ़ रहे हैं, भू-राजनीतिक तनाव हैं और सप्लाई चेन बार-बार टूट रही है. ऐसे माहौल में हर देश को भरोसेमंद खाद्य आपूर्तिकर्ता चाहिए. भारत इस मामले में मजबूत स्थिति में है, क्योंकि यहां उत्पादन बड़ा है और घरेलू मांग भी स्थिर है.

जब मैन्युफैक्चरिंग और दूसरे सेक्टर वैश्विक झटकों से प्रभावित होते हैं, तब खेती अपेक्षाकृत स्थिर रहती है. यही कारण है कि सरकार अब खेती को सिर्फ सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत के रूप में देख रही है.

पुरानी कमजोरियां अब भी चुनौती बनी हुई हैं

भारत की खेती की सबसे बड़ी समस्या छोटे और बिखरे खेत हैं. ज्यादातर किसान कम जमीन पर खेती करते हैं, जिससे आधुनिक मशीनों और तकनीक का पूरा फायदा नहीं मिल पाता. पानी की कमी, मौसम का बदलता मिजाज और बढ़ती लागत भी परेशानी बढ़ाती है. इसके अलावा, खेत से बाजार तक की कड़ी कमजोर है. फूड प्रोसेसिंग, कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट की कमी के कारण किसान अपनी उपज का पूरा दाम नहीं पा पाते. बहुत सारा उत्पादन खराब भी हो जाता है.

संकट के समय खेती ने देश को संभाला

कोरोना महामारी हो या हाल के वैश्विक व्यापार संकट, जब कई सेक्टरों की रफ्तार थम गई, तब भी खेती ने देश की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया. घरेलू बाजार ने किसानों को एक आधार दिया और चावल, मसाले, डेयरी, झींगा और प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पादों के निर्यात ने नए मौके खोले. इससे यह साफ हुआ कि खेती में संकट झेलने की ताकत है और सही नीति मिलने पर यह और मजबूत बन सकती है.

झींगा उद्योग से मिला सबक

जब भारतीय झींगा निर्यात पर कुछ देशों ने टैरिफ बढ़ाए, तो एक झटके में कारोबार प्रभावित हुआ. लेकिन इससे यह सीख भी मिली कि एक ही बाजार पर निर्भर रहना खतरनाक है. इसके बाद निर्यातकों ने नए देशों की ओर रुख किया, घरेलू खपत बढ़ाने पर ध्यान दिया और वैल्यू-एडेड यानी प्रोसेस्ड उत्पादों पर जोर दिया. यही मॉडल अब दूसरी फसलों और खाद्य उत्पादों पर भी लागू किया जा सकता है.

अब भी क्या रुकावट है?

सबसे बड़ी समस्या नीतियों की अनिश्चितता है. कभी अचानक निर्यात पर रोक लग जाती है, तो कभी नियम बदल जाते हैं. इससे भारत की छवि एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में कमजोर होती है. लॉजिस्टिक्स महंगे हैं, कोल्ड चेन अधूरी है और घरेलू कृषि नीतियों व व्यापार नीतियों में तालमेल की कमी दिखती है.

बजट 2026 से सरकार क्या करना चाहती है?

बजट 2026 में सरकार की कोशिश यह दिख रही है कि खेती को केवल राहत पैकेज और सब्सिडी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे एक मजबूत आर्थिक इंजन के रूप में विकसित किया जाए. सरकार समझती है कि जब तक खेती में निवेश नहीं बढ़ेगा, तब तक किसानों की आय, निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थायी सुधार संभव नहीं है. इसलिए बजट में फोकस खेती की बुनियादी संरचना को मजबूत करने पर हो सकता है. कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, आधुनिक मंडियां और रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट पर खर्च बढ़ाकर खेत से बाजार तक की दूरी कम करने की योजना बनाई जा सकती है, ताकि किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिल सके और खराब होने वाली फसलों का नुकसान घटे.

सरकार फूड प्रोसेसिंग को भी खेती के भविष्य की अहम कड़ी मान रही है. बजट 2026 में ऐसे क्लस्टर्स और इकाइयों को बढ़ावा दिया जा सकता है, जहां किसान, छोटे उद्योग और बड़े प्रोसेसर एक साथ जुड़ें. इससे कच्ची फसल की जगह प्रोसेस्ड और वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार होंगे, जिनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा मांग है. इसका सीधा फायदा यह होगा कि किसानों की उपज की कीमत बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.

इसके अलावा, सरकार निर्यात नीति को ज्यादा स्थिर और भरोसेमंद बनाने पर भी ध्यान दे सकती है. बार-बार लगने वाले निर्यात प्रतिबंधों से बचते हुए ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा बना रहे. गुणवत्ता जांच, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सर्टिफिकेशन पर बजटीय समर्थन देकर भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक पहचान मजबूत की जा सकती है.

डिजिटल तकनीक और डेटा आधारित खेती भी सरकार की प्राथमिकता में हो सकती है. फसल आकलन, बीमा, बाजार भाव और मौसम से जुड़ी जानकारी को तकनीक के जरिए किसानों तक तेजी से पहुंचाने पर जोर दिया जा सकता है. कुल मिलाकर बजट 2026 के जरिए सरकार यह संदेश देना चाहती है कि खेती अब सिर्फ खर्च का क्षेत्र नहीं, बल्कि निवेश, निर्यात और दीर्घकालिक विकास का मजबूत आधार है.

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